मालूमात के मुताबिक़, इस पाँच दिवसीय ट्रेनिंग में शामिल अफ़राद को डिजिटल कंटेंट तैयार करने, वीडियो एडिटिंग, ग्राफ़िक डिज़ाइन, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स के इस्तेमाल, ऑनलाइन कैंपेन चलाने और झूठी ख़बरों को तेज़ी से फैलाने की बाक़ायदा ट्रेनिंग दी गई। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि दहशतगर्द तंज़ीमें अब सिर्फ़ बंदूक़ और बारूद तक महदूद नहीं रहीं, बल्कि इंटरनेट और सोशल मीडिया को भी अपने प्रोपेगेंडा का अहम हथियार बना चुकी हैं।
जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क अब डिजिटल दुनिया को अपनी नई जंग का मैदान बना रहे हैं। सोशल मीडिया के ज़रिये झूठी, भ्रामक और भड़काऊ सामग्री तैयार कर नौजवानों को गुमराह करने, भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने और समाज में नफ़रत का माहौल पैदा करने की कोशिशें लगातार तेज़ की जा रही हैं। यह ट्रेनिंग इसी सुनियोजित मुहिम का हिस्सा मानी जा रही है।
रिपोर्ट्स से यह भी इशारा मिलता है कि ट्रेनिंग के दौरान प्रतिभागियों को फ़र्ज़ी अकाउंट बनाने, अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म्स पर एक ही संदेश को संगठित तरीक़े से फैलाने, वीडियो और तस्वीरों के ज़रिये भावनात्मक माहौल तैयार करने और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर आतंकी एजेंडे को आगे बढ़ाने के तौर-तरीक़े सिखाए गए। इससे यह साबित होता है कि आतंकवाद अब केवल ज़मीनी स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि साइबर और सूचना के मोर्चे पर भी पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम पाकिस्तान की उस दोहरी नीति को एक बार फिर उजागर करता है, जिसमें एक तरफ़ वह आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई का दावा करता है, जबकि दूसरी तरफ़ उसकी सरज़मीं से सक्रिय तंज़ीमें आधुनिक डिजिटल साधनों के ज़रिये अपना प्रोपेगेंडा मज़बूत करती दिखाई देती हैं। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम इस बात का संकेत हैं कि दुष्प्रचार अब इन संगठनों की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाली हर सनसनीख़ेज़ पोस्ट, वीडियो या संदेश पर आँख मूँदकर यक़ीन करना ख़तरनाक साबित हो सकता है। दहशतगर्द नेटवर्क अक्सर भावनाओं को भड़काने, समाज में अविश्वास फैलाने और युवाओं को प्रभावित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है कि किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई की तस्दीक़ ज़रूर करे।
सुरक्षा एजेंसियाँ लगातार ऐसे डिजिटल नेटवर्क पर नज़र बनाए हुए हैं और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के ज़रिये फैलाए जा रहे दुष्प्रचार को बेनक़ाब करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। साइबर निगरानी, डिजिटल फ़ॉरेंसिक और समन्वित कार्रवाई के माध्यम से उन तत्वों की पहचान की जा रही है जो इंटरनेट का इस्तेमाल कर आतंकवाद और कट्टरपंथी सोच को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं।
यह पूरा घटनाक्रम इस हक़ीक़त को सामने लाता है कि आज की लड़ाई केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप और सोशल मीडिया के मंचों पर भी लड़ी जा रही है। पाकिस्तान समर्थित आतंकी तंज़ीमें अब डिजिटल प्रोपेगेंडा को अपने सबसे असरदार औज़ारों में शामिल कर चुकी हैं। ऐसे में जनता के लिए डिजिटल जागरूकता, तथ्य आधारित जानकारी और अफ़वाहों से सतर्क रहना पहले से कहीं ज़्यादा अहम हो गया है।


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