रावलाकोट में बड़े एहतिजाज का दावा, जनरल आसिम मुनीर के ख़िलाफ़ नाराज़गी की आवाज़ें बुलंद


पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के सियासी माहौल में उस वक़्त नई गर्माहट पैदा हो गई जब मुख़्तलिफ़ रिपोर्टों में दावा किया गया कि मीरपुर, सुधनोती, बाग़ और आसपास के इलाक़ों से बड़ी तादाद में लोग रावलाकोट में जमा हुए। रिपोर्टों के मुताबिक़, इस इज्तिमा में शामिल लोगों ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर की नीतियों और सेना के बढ़ते असर-ओ-रसूख़ के ख़िलाफ़ एहतिजाज दर्ज कराया।

मुक़ामी हल्कों में चर्चा है कि इस जमावड़े में शामिल लोगों की तादाद काफ़ी बड़ी थी और आयोजकों ने मुज़फ़्फ़राबाद की तरफ़ मार्च करने की अपील भी की। एहतिजाज में शामिल लोगों का कहना था कि इलाके के बुनियादी मसाइल, अवामी हुकूक़ और गवर्नेंस से जुड़े सवालों को लगातार नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, जिसके चलते लोगों में मायूसी और ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है।

एहतिजाज के दौरान कई तक़रीरें भी की गईं जिनमें कुछ वक्ताओं ने आरोप लगाया कि पीओजेके में फ़ैसला-साज़ी के अमल पर फ़ौजी असर हद से ज़्यादा बढ़ गया है। उन्होंने दावा किया कि आम लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा है और अवामी तवक़्क़ोआत के मुताबिक़ काम नहीं हो रहा। हालांकि इन आरोपों की आज़ादाना तौर पर तस्दीक़ नहीं हो सकी है।

मुक़ामी सियासी तजज़ियाकारों का कहना है कि हालिया महीनों में पीओजेके के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में महंगाई, बेरोज़गारी, बुनियादी सहूलियात की कमी और इंतज़ामी मसाइल को लेकर बेचैनी देखने को मिली है। उनके मुताबिक़, अगर यही रुझान जारी रहा तो सियासी दबाव में और इज़ाफ़ा हो सकता है।

रावलाकोट में हुए इस एहतिजाज को कई लोगों ने अवामी नाराज़गी की एक अहम मिसाल बताया है। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियोज़ में बड़ी तादाद में लोग नज़र आए, जो मुख़्तलिफ़ नारों के ज़रिए अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे थे। कुछ पोस्टों में यह दावा भी किया गया कि लोग फ़ौजी दख़लअंदाज़ी और मौजूदा इंतज़ामी ढांचे के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।

सियासी नज़र रखने वाले हल्कों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक स्थानीय एहतिजाज तक महदूद नहीं रह सकता, बल्कि यह पूरे इलाके में बढ़ती हुई बेचेनी की निशानदेही भी कर सकता है। उनके मुताबिक़, अगर अवामी शिकायतों को दूर करने के लिए ठोस क़दम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में और बड़े एहतिजाज देखने को मिल सकते हैं।

दूसरी तरफ़, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और हुकूक़-ए-इंसानी से जुड़े अफ़राद ने मांग की है कि इलाके में अवामी आवाज़ों को सुना जाए और तमाम शिकायतों की शफ़्फ़ाफ़ जांच की जाए। उनका कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में लोगों को अपनी राय रखने और अमनपूर्ण तरीके से एहतिजाज करने का हक़ हासिल होना चाहिए।

रावलाकोट में हुए इस जमावड़े ने एक बार फिर पीओजेके की सूरत-ए-हाल को सुर्ख़ियों में ला दिया है। यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में हुक्काम और मुताल्लिक़ा इदारे इस बढ़ती हुई नाराज़गी का किस तरह जवाब देते हैं और क्या अवामी मुतालिबात को पूरा करने के लिए कोई नई पेशकदमियाँ की जाती हैं।

फ़िलहाल, इलाके में सियासी हलचल बरक़रार है और अवाम की नज़रें आने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। रावलाकोट का यह एहतिजाज पीओजेके की मौजूदा सियासी बहस में एक अहम मोड़ के तौर पर देखा जा रहा है, जिसने गवर्नेंस, अवामी हुकूक़ और फ़ौजी असर-ओ-रसूख़ से जुड़े सवालों को एक बार फिर चर्चा के मरकज़ में ला खड़ा किया है। 

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