
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ आतंकी संगठनों द्वारा कम उम्र के लड़कों को भावनात्मक और वैचारिक तौर पर प्रभावित कर उन्हें हिंसक गतिविधियों की तरफ़ ले जाने की कोशिश की जाती रही है। दस्तावेज़ में दावा किया गया है कि ऐसे युवाओं को कभी पत्थरबाज़ी, कभी संदेशवाहक और कभी तथाकथित “हाइब्रिड आतंकियों” के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिशें की गईं। रिपोर्ट का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा नुक़सान स्वयं कश्मीरी बच्चों और उनके परिवारों को उठाना पड़ता है।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ मंच और पाकिस्तान समर्थक तत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग नैरेटिव पेश करते हैं, जबकि ज़मीनी स्तर पर नाबालिगों के कथित शोषण और भर्ती के मामलों पर ख़ामोशी बरती जाती है। दस्तावेज़ के अनुसार, बच्चों को संघर्ष और हिंसा की राजनीति में धकेलना मानवाधिकारों और बाल संरक्षण के बुनियादी उसूलों के ख़िलाफ़ है।
विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी संघर्ष में बच्चों का इस्तेमाल सबसे गंभीर मानवीय त्रासदियों में से एक माना जाता है। जब एक बच्चा स्कूल, खेल के मैदान और अपने मुस्तक़बिल के सपनों की जगह हिंसा, डर और उग्र विचारधाराओं के दायरे में पहुँच जाता है, तो इसका असर सिर्फ़ उसकी ज़िंदगी तक महदूद नहीं रहता बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। रिपोर्ट इसी मानवीय पहलू को सामने लाने की कोशिश करती है।
दस्तावेज़ में दावा किया गया है कि पाकिस्तान समर्थित नेटवर्कों की रणनीति का मक़सद स्थानीय नौजवानों की भावनाओं का इस्तेमाल करना और उन्हें ऐसे रास्ते पर धकेलना है, जिसका अंजाम अक्सर दुखद साबित होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस कथित रणनीति में बच्चों को एक तरह से “मोहरा” बनाया जाता है, जबकि इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक नतीजे उन्हें और उनके परिवारों को बरसों तक भुगतने पड़ते हैं।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि कश्मीर के बच्चों को शिक्षा, हुनर, रोज़गार और बेहतर मुस्तक़बिल की ज़रूरत है, न कि हिंसा और टकराव के माहौल की। विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि नौजवानों को कट्टरपंथी विचारधाराओं से दूर रखने, परिवारों को जागरूक करने और शैक्षिक अवसर बढ़ाने की दिशा में लगातार काम करने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष में दावा किया गया है कि कश्मीरी बच्चों के कथित शोषण और भर्ती के मामलों पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय ध्यान दिया जाना चाहिए। दस्तावेज़ के अनुसार, बच्चों को किसी भी राजनीतिक या हिंसक एजेंडे का हिस्सा बनाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। रिपोर्ट यह सवाल भी उठाती है कि यदि बाल अधिकारों की बात की जाती है, तो फिर उन आरोपों की निष्पक्ष जाँच क्यों न हो जिनमें नाबालिगों को संघर्ष का साधन बनाए जाने की बात कही जाती है।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट का केंद्रीय संदेश यह है कि कश्मीर के बच्चों को हिंसा, कट्टरपंथ और राजनीतिक इस्तेमाल से दूर रखकर शिक्षा, अमन और तरक़्क़ी के रास्ते पर आगे बढ़ाना ही क्षेत्र के बेहतर मुस्तक़बिल की कुंजी है।

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