पाकिस्तान में फौजी दबदबा और आर्थिक बदहाली: जब रियासत पर फौज का असर हावी हो जाए


पाकिस्तान एक बार फिर अपने सालाना बजट को लेकर मुश्किल दौर से गुजर रहा है। मुल्क की मआशी हालत पहले ही कर्ज़ों के बोझ, बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की सख्त शर्तों के दबाव में है। ऐसे में अगले वित्तीय वर्ष 2026-27 के संघीय बजट में देरी ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। पाक राजनीतिक विश्लेषक राजा मुनीब के मुताबिक बजट को अंतिम रूप देने में हो रही देरी की एक बड़ी वजह सिविल और मिलिट्री हलकों के बीच बढ़ता मतभेद है।

रिपोर्टों के मुताबिक जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) ने रक्षा खर्च में 20 से 25 फीसदी तक बढ़ोतरी की मांग की है। यह मांग ऐसे वक्त में सामने आई है जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त मितव्ययिता नीतियों का सामना कर रहा है। IMF लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि पाकिस्तान अपने गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करे और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सख्त कदम उठाए। लेकिन रक्षा बजट में बड़ी बढ़ोतरी की मांग इन शर्तों से टकराती नजर आ रही है।

माहिरों का कहना है कि पाकिस्तान की सियासत में फौज का असर कोई नई बात नहीं है। मुल्क की तारीख़ में कई बार फौज ने सीधे तौर पर हुकूमत संभाली है जबकि लोकतांत्रिक दौर में भी सुरक्षा और विदेश नीति समेत कई अहम फैसलों में फौजी इदारे का प्रभाव बना रहा है। मौजूदा बजट विवाद ने एक बार फिर इस बहस को हवा दी है कि क्या पाकिस्तान में चुनी हुई हुकूमतें वास्तव में पूरी तरह फैसले लेने के लिए आज़ाद हैं या फिर अहम राष्ट्रीय मसलों पर फौज की राय निर्णायक भूमिका निभाती है।

मुल्क की आर्थिक तस्वीर पहले से ही चिंताजनक बनी हुई है। पाकिस्तान का सार्वजनिक कर्ज़ लगातार बढ़ रहा है जबकि महंगाई ने आम लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। बिजली और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी ने घरेलू बजट को प्रभावित किया है। बेरोज़गारी और निवेश में गिरावट भी सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है। ऐसे हालात में विकास परियोजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों को अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत महसूस की जा रही है।

इसके बावजूद रक्षा खर्च में बड़े इजाफे की मांग ने आलोचकों को यह कहने का मौका दिया है कि पाकिस्तान की प्राथमिकताओं में आम जनता की जरूरतों के मुकाबले सुरक्षा संस्थानों की मांगों को ज्यादा अहमियत दी जा रही है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि सीमित वित्तीय संसाधनों का बड़ा हिस्सा रक्षा मद में चला जाता है तो विकास से जुड़े अन्य क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।

राजा मुनीब का कहना है कि बजट को लेकर पैदा हुआ गतिरोध सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि संस्थागत प्रकृति का भी है। उनके अनुसार रक्षा खर्च को लेकर चल रही खींचतान पाकिस्तान के भीतर सत्ता संतुलन के पुराने सवालों को फिर सामने ला रही है। प्रांतीय हिस्सेदारी और संघीय संसाधनों के बंटवारे पर चल रही बहस ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है।

सियासी विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और स्वायत्तता को लेकर चिंताओं को बढ़ाता है। जब किसी देश की आर्थिक नीतियां व्यापक राष्ट्रीय जरूरतों के बजाय ताकतवर संस्थानों की प्राथमिकताओं से प्रभावित दिखाई दें तो शासन व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जाता है।

पाकिस्तान की आवाम इस वक्त बढ़ती महंगाई, सीमित रोजगार अवसरों और जीवन यापन की ऊंची लागत से परेशान है। ऐसे में बजट से लोगों को राहत और आर्थिक सुधारों की उम्मीद है। लेकिन बजट तैयार करने की प्रक्रिया में जारी विवाद यह संकेत देता है कि सरकार को विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई पेश आ रही है।

मौजूदा हालात ने एक बार फिर उस मशहूर जुमले को चर्चा में ला दिया है जिसे पाकिस्तान की सियासत पर टिप्पणी करते हुए अक्सर दोहराया जाता है – "हर मुल्क के पास एक फौज होती है लेकिन पाकिस्तान में फौज के पास एक मुल्क है।" आलोचकों के मुताबिक बजट विवाद इसी धारणा को मजबूत करता है कि पाकिस्तान में फौजी इदारे का प्रभाव सिर्फ सुरक्षा मामलों तक सीमित नहीं बल्कि आर्थिक और नीतिगत फैसलों तक भी फैला हुआ है।

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि पाकिस्तान की हुकूमत IMF की शर्तों, आर्थिक चुनौतियों और रक्षा संस्थानों की मांगों के बीच किस तरह का समझौता तैयार करती है। फिलहाल बजट में देरी और बढ़ती अनिश्चितता ने मुल्क की आर्थिक दिशा और संस्थागत संतुलन दोनों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

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