पाकिस्तान में बढ़ता गुस्सा : लक्की मरवत हमले के बाद सड़कों पर उतरी अवाम


पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तूनख्वा सूबे के लक्की मरवत इलाक़े में आज हुए घातक हमले के बाद पूरा माहौल गरमा गया। इलाके में ज़बरदस्त एहतिजाज देखने को मिला, जहाँ लोगों ने सड़कों पर निकलकर पाक फौज और खुफिया एजेंसी ISI के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी की। अवाम का कहना है कि मुल्क में बढ़ती हिंसा और दहशतगर्दी के पीछे वही ताकतें हैं जो खुद को अमन का रखवाला बताती हैं।

मुकामी लोगों के मुताबिक, लक्की मरवत में हुए इस हमले के बाद गुस्सा इसलिए और बढ़ गया क्योंकि लोगों को शक है कि इस पूरे वाकये के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों की “डबल गेम” मौजूद है। एहतिजाज कर रहे नौजवानों और बुज़ुर्गों ने खुले अल्फ़ाज़ में कहा कि मुल्क की मिलिट्री और ISI बरसों से दहशतगर्द गिरोहों को पालती रही हैं, और अब वही आग पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों को भी जला रही है।

कश्मीरी लहजे में बोलते हुए कई प्रदर्शनकारियों ने कहा, “ये कैसी हुकूमत छू, जो अपनी अवामुक हिफाज़त करन्युक बजाय, दहशतगर्दन हिकमत-ए-अमली बनावान छे?” यानी, यह कैसी सरकार है जो जनता की सुरक्षा के बजाय आतंक को रणनीति के तौर पर इस्तेमाल कर रही है।

सियासी जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान लंबे अरसे से आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाता आया है। जम्मू-कश्मीर से लेकर अफगानिस्तान तक, कई आतंकी संगठनों को पाकिस्तानी फौज और ISI की सरपरस्ती मिलने के आरोप बार-बार सामने आते रहे हैं। अब वही नेटवर्क पाकिस्तान के अंदर भी हिंसा फैला रहे हैं, जिससे आम अवाम का भरोसा पूरी तरह टूटता जा रहा है।

लक्की मरवत की घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी पाक मिलिट्री के खिलाफ़ गुस्से की लहर देखने को मिली। लोगों ने सवाल उठाया कि अगर फौज और एजेंसियां इतनी ताकतवर हैं, तो फिर मुल्क में लगातार हमले क्यों हो रहे हैं? कई पोस्टों में यह इल्ज़ाम लगाया गया कि “गुड टेररिस्ट” और “बैड टेररिस्ट” की नीति ने पाकिस्तान को तबाही के रास्ते पर ला खड़ा किया है।

माहिरीन का कहना है कि पाकिस्तान की फौज ने दशकों तक आतंकवाद को “स्ट्रैटेजिक एसेट” की तरह इस्तेमाल किया। कभी कश्मीर में घुसपैठ के लिए, कभी अफगानिस्तान में असर बढ़ाने के लिए, तो कभी घरेलू सियासत को कंट्रोल करने के लिए। लेकिन अब यही हथियार पाकिस्तान के अपने शहरों और बाज़ारों में खून-खराबे की वजह बन रहा है।

लक्की मरवत में हुए विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर यह साफ कर दिया कि पाकिस्तानी अवाम का एक बड़ा हिस्सा अब मिलिट्री और ISI की नीतियों से तंग आ चुका है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक आतंकवाद के सहारे मुल्क की सियासत चलाई जाएगी? कब तक नौजवानों की जानें इस “डीप स्टेट” की नाकाम पॉलिसियों की भेंट चढ़ती रहेंगी?

विश्लेषकों के मुताबिक, पाकिस्तान आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसकी सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी है। एक तरफ आर्थिक बदहाली, दूसरी तरफ राजनीतिक अस्थिरता, और ऊपर से आतंकवाद का बढ़ता साया — इन सबने मुल्क को गहरे संकट में डाल दिया है।

आज लक्की मरवत की सड़कों पर गूंजते नारों ने दुनिया को यह पैगाम दिया कि पाकिस्तान की अवाम अब खामोश रहने को तैयार नहीं। लोग खुलकर कह रहे हैं कि अगर मुल्क में अमन चाहिए, तो सबसे पहले आतंकवाद को पालने वाली सोच और उसे सहारा देने वाले नेटवर्क को खत्म करना होगा।

यही वजह है कि अब पाकिस्तान को दुनिया भर में “एपिसेंटर ऑफ टेररिज्म” यानी आतंकवाद का केंद्र कहा जाने लगा है। क्योंकि जब तक मिलिट्री और खुफिया एजेंसियां दहशतगर्दी को अपनी ताकत का जरिया बनाती रहेंगी, तब तक न पाकिस्तान में अमन आएगा और न ही पूरे इलाके में स्थिरता कायम हो पाएगी।

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