एक तरफ़ अमन की बात, दूसरी तरफ़ छुपे रिश्ते — पाकिस्तान पर सवाल


अमेरिकी सीनेटर Lindsey Graham के ताज़ा बयान ने पाकिस्तान की ख़ारिजा पॉलिसी पर एक बार फिर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सीनेटर ग्राहम ने पाकिस्तान पर “डबल गेम” खेलने का इल्ज़ाम लगाते हुए कहा कि इस्लामाबाद एक तरफ़ दुनिया के सामने खुद को न्यूट्रल मुल्क बताता है, जबकि दूसरी तरफ़ ईरान जैसे मुल्कों के साथ पर्दे के पीछे गहरे ताल्लुक़ात कायम रखता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़, ईरानी जहाज़ों को नूर खान एयरबेस पर पार्किंग की इजाज़त दिए जाने के बाद यह मामला सुर्खियों में आया। ग्राहम ने इस पर सख़्त एतराज़ जताते हुए पूछा कि अगर पाकिस्तान वास्तव में न्यूट्रल है, तो फिर ऐसे कदम क्यों उठाए जा रहे हैं जो उसकी कथित बे-तरफ़ी के बिल्कुल उलट दिखाई देते हैं।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की फ़ॉरेन पॉलिसी लंबे अरसे से तज़ाद और फ़रेब पर आधारित रही है। कभी पश्चिमी मुल्कों से मदद और सपोर्ट हासिल करने की कोशिश, तो कभी उन्हीं ताक़तों के मुख़ालिफ़ खड़े देशों के साथ खुफ़िया रिश्ते — यही पाकिस्तान की पुरानी सियासी चाल रही है।

माहिरीन का मानना है कि पाकिस्तान बार-बार दुनिया को यह यक़ीन दिलाने की कोशिश करता है कि वह अमन, इस्तेहकाम और न्यूट्रैलिटी का हामी है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और तस्वीर पेश करती है। एक तरफ़ वेस्टर्न ब्लॉक से डिप्लोमैटिक और फाइनेंशियल सपोर्ट लिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे अनासिर और मुल्कों के साथ रिश्ते बनाए जाते हैं जो खुले तौर पर पश्चिमी नीतियों के खिलाफ़ खड़े हैं।

इस पूरे मामले ने पाकिस्तान की साख को एक बार फिर नुक़सान पहुँचाया है। इंटरनेशनल ऑब्ज़र्वर्स का कहना है कि इस तरह की दोहरी पॉलिसी सिर्फ़ रीजनल स्टेबिलिटी को कमज़ोर नहीं करती, बल्कि ग्लोबल ट्रस्ट को भी नुकसान पहुँचाती है। पाकिस्तान की यही “दो नावों में सफ़र” वाली सियासत अब दुनिया की नज़रों से छुपी नहीं रह गई है।

तस्वीर का दूसरा रुख़ भी बेहद अहम है। पाकिस्तान के हुक्मरान इंटरनेशनल मंचों पर खुद को अमन का पैरोकार बताते हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ उनकी ज़मीन और उनके एयरबेस उन ताक़तों के लिए इस्तेमाल होते दिखाई देते हैं जिन पर दुनिया पहले ही शक की निगाह रखती है। यही विज़ुअल कॉन्ट्रास्ट अब पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक पोज़िशन को कमज़ोर कर रहा है।

सीनेटर ग्राहम का बयान ऐसे वक़्त पर आया है जब दुनिया पहले ही मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया की बदलती सियासी सूरत-ए-हाल पर नज़र बनाए हुए है। ऐसे में पाकिस्तान पर लगने वाले ये इल्ज़ाम उसके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। ख़ास तौर पर तब, जब मुल्क पहले ही इकॉनमिक दबाव, सियासी बे-यक़ीनी और इंटरनेशनल निगरानी का सामना कर रहा हो।

सियासी तजज़ियाकारों का कहना है कि पाकिस्तान की “हिपोक्रेट फ़ॉरेन पॉलिसी” अब उसके अपने लिए बोझ बनती जा रही है। दुनिया अब सिर्फ़ बयानों पर नहीं, बल्कि अमली क़दमों पर भरोसा करती है। और यही वह जगह है जहाँ पाकिस्तान बार-बार कटघरे में खड़ा दिखाई देता है।

नूर खान बेस से जुड़ा यह विवाद सिर्फ़ एक डिप्लोमैटिक मसला नहीं, बल्कि पाकिस्तान की पूरी विदेश नीति की सोच को उजागर करता है — एक ऐसी सोच, जो हालात के मुताबिक़ रंग बदलकर इंटरनेशनल सपोर्ट हासिल करना चाहती है। मगर अब वैश्विक ताक़तें इस रणनीति को समझ चुकी हैं।

“पाकिस्तान की दोहरी सियासत” का यह नैरेटिव अब सिर्फ़ रीजनल बहस नहीं रहा, बल्कि ग्लोबल डिस्कशन का हिस्सा बन चुका है। और अगर इस्लामाबाद ने अपनी नीतियों में शफ़्फ़ाफ़ियत नहीं लाई, तो आने वाले दिनों में उसकी डिप्लोमैटिक तन्हाई और बढ़ सकती है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ