
सूत्रों के मुताबिक, तल्हा सईद हाल के दिनों में पाकिस्तान के कई प्रभावशाली राजनीतिक और धार्मिक चेहरों से मुलाक़ात करता देखा गया। इन मुलाक़ातों की तस्वीरें और खबरें सामने आने के बाद यह बहस तेज हो गई कि क्या पाकिस्तान का सियासी निज़ाम अब खुलकर उन तत्वों को जगह दे रहा है जिनका नाम अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से जुड़ा रहा है।
माहिरीन का कहना है कि शेख रशीद जैसे वरिष्ठ नेता के साथ तल्हा सईद की नज़दीकियां यह दिखाती हैं कि पाकिस्तान में दहशतगर्द नेटवर्क और राजनीतिक ताकतों के बीच एक पुराना रिश्ता अब फिर सतह पर आने लगा है। अवाम के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि जब दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात होती है, तब पाकिस्तान में ऐसे लोगों को सियासी मंच और अहमियत क्यों दी जा रही है।
तल्हा सईद का नाम पहले भी कई कट्टरपंथी गतिविधियों से जुड़ता रहा है। हालांकि पाकिस्तान की हुकूमत अक्सर यह दावा करती रही है कि वह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, लेकिन जमीनी तस्वीर कुछ और ही बयान करती नजर आती है। सियासी गलियारों में तल्हा सईद की मौजूदगी ने यह धारणा मजबूत की है कि पाकिस्तान में कुछ ताकतें अब भी दहशतगर्द तंजीमों को “रणनीतिक हथियार” के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती हैं।
दिफाई और सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम सिर्फ पाकिस्तान की घरेलू सियासत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है। जिस तरह से आतंकी संगठनों से जुड़े लोग खुलेआम राजनीतिक नेताओं के साथ दिखाई दे रहे हैं, उससे यह संदेश जाता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई महज़ दिखावा बनकर रह गई है।
अंतरराष्ट्रीय बिरादरी पहले ही पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर कई बार चेतावनी दे चुकी है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी FATF भी पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाल चुका है और बार-बार आतंकी फंडिंग रोकने के लिए सख्त कदम उठाने को कह चुका है। लेकिन अब तल्हा सईद जैसे चेहरों की राजनीतिक पहुंच यह साबित करती नजर आ रही है कि पाकिस्तान की सत्ता और दहशतगर्द तंजीमों के बीच का रिश्ता अभी खत्म नहीं हुआ।
कश्मीर और क्षेत्रीय सुरक्षा के मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे अरसे से “अच्छे और बुरे आतंकवाद” की नीति पर चलता आया है। यही वजह है कि कुछ संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का दिखावा किया जाता है, जबकि पर्दे के पीछे उन्हें संरक्षण भी मिलता रहता है। तल्हा सईद और पाक नेताओं की मुलाक़ात इसी खतरनाक नीति का नया उदाहरण मानी जा रही है।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर काफी बहस छिड़ गई है। कई यूज़र्स ने सवाल उठाया कि अगर पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ है, तो फिर आतंकवाद से जुड़े परिवारों और संगठनों को राजनीतिक स्वीकार्यता क्यों मिल रही है। कुछ लोगों ने इसे पाकिस्तान की “डबल गेम” नीति करार दिया, जहां एक तरफ दुनिया को अमन का पैगाम दिया जाता है और दूसरी तरफ आतंकी नेटवर्क को भीतर ही भीतर सहारा मिलता रहता है।
सियासी विश्लेषकों का कहना है कि यह पूरा मामला पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख को और नुकसान पहुंचा सकता है। पहले ही आर्थिक बदहाली, सियासी अस्थिरता और चरमपंथ की वजह से पाकिस्तान दुनियाभर में आलोचना झेल रहा है। ऐसे में आतंकवाद से जुड़े चेहरों का मुख्यधारा की राजनीति में दिखाई देना इस बात का संकेत है कि मुल्क अब भी कट्टरपंथी तत्वों के प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर उस नैरेटिव को मजबूत किया है जिसमें पाकिस्तान को “दहशतगर्दी का गढ़” कहा जाता है। तल्हा सईद और पाक सियासी नेताओं की मुलाक़ातें यह सवाल खड़ा कर रही हैं कि आखिर कब तक पाकिस्तान आतंकवाद और सियासत के इस खतरनाक गठजोड़ से इनकार करता रहेगा। फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पाकिस्तान इन खुलासों पर क्या सफाई देता है और क्या वास्तव में वह आतंकवाद के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाएगा या फिर यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा।

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