दहशत के साये से निकलता कश्मीर, अमन और तरक़्क़ी की ओर बढ़ते क़दम


हर साल 21 मई को भारत में “एंटी-टेररिज़्म डे” यानी आतंकवाद विरोधी दिवस मनाया जाता है, ताकि लोगों में दहशतगर्दी, हिंसा और इंतिहापसंदी के खिलाफ जागरूकता पैदा की जा सके। यह दिन मुल्क के साबक़ा वज़ीर-ए-आज़म Rajiv Gandhi की 1991 में हुई शहादत की याद में मनाया जाता है। यह दर्दनाक हादसा पूरे मुल्क को यह एहसास दिलाता है कि आतंकवाद जम्हूरियत, इंसानियत और क़ौमी यकजहती के लिए कितना तबाहकुन साबित होता है। पूरे हिंदुस्तान में स्कूलों, कॉलेजों और इदारों में अमन, भाईचारे और हमआहंगी को बढ़ावा देने के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम और हलफ़बर्दारी तकरीबात मुनक्किद की जाती हैं। अगरचे एंटी-टेररिज़्म डे हर हिंदुस्तानी के लिए अहमियत रखता है, मगर Jammu and Kashmir के लोगों के लिए इसकी अहमियत कहीं ज़्यादा जज़्बाती और गहरी है, क्योंकि यह इलाक़ा दशकों से दहशतगर्दी के दर्दनाक असरात झेलता आया है।

दुनिया भर में अपनी खूबसूरत वादियों, बुलंद पहाड़ों, पुरसुकून झीलों, रंगीन बाग़ात और शानदार तहज़ीब के लिए मशहूर कश्मीर को बरसों से “धरती का जन्नत” कहा जाता रहा है। लेकिन इस फ़ितरी हुस्न के पीछे एक लंबी दर्दभरी दास्तान छुपी हुई है, जिसे आतंकवाद, खौफ़ और बेयक़ीनी ने गहरा ज़ख्म दिया है। Jammu and Kashmir के लोगों ने अपनी आँखों से देखा है कि दहशतगर्दी सिर्फ जानें नहीं लेती, बल्कि लोगों के ख्वाब, रोज़गार, तालीमी मौके और समाजी अमन भी तबाह कर देती है। आतंकवाद का सबसे बड़ा नुक़सान आम अवाम ने उठाया है — चाहे वो तलबा हों, दुकानदार, उस्ताद, मज़दूर, सैलानी या फिर अपने घरों में अमन से जीने की ख्वाहिश रखने वाले खानदान।

कश्मीर में आतंकवाद ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बुरी तरह मुतास्सिर किया। ऐसे कई दौर आए जब डर और बेयक़ीनी आम ज़िंदगी का हिस्सा बन गए। वालिदैन हर वक्त अपने बच्चों और अहल-ए-खाना की सलामती को लेकर फ़िक्रमंद रहते थे। बच्चों ने बचपन से ही हिंसा और गोलीबारी की खौफ़नाक कहानियाँ सुनीं, जबकि बहुत से लोगों ने लगातार तनाव और बेचेनी का सामना किया। आतंकवाद ऐसा माहौल पैदा करता है जहाँ भरोसा कमज़ोर पड़ जाता है और खौफ़ ख़ामोशी से पूरे समाज में फैल जाता है। चाहे कोई वारदात दूर किसी इलाके में हो, उसका जज़्बाती असर हजारों घरों तक पहुँच जाता है। दहशतगर्दी के छोड़े हुए ज़ख्म अक्सर बरसों तक लोगों के दिलों में बाकी रहते हैं।

कश्मीर में आतंकवाद से सबसे ज़्यादा मुतास्सिर होने वाले शोबों में तालीम भी शामिल रही है। वादी के तलबा ने बरसों तक अशांति और बेयक़ीनी की वजह से अपनी पढ़ाई में कई रुकावटें देखीं। कई दफा स्कूल और कॉलेज लंबे अरसे तक बंद रहे, जिससे तालीमी सफर और मुस्तकबिल दोनों प्रभावित हुए। मुकाबलाती इम्तिहानों की तैयारी करने वाले नौजवानों की पढ़ाई बार-बार रुकती रही। मगर इन तमाम मुश्किलात के बावजूद कश्मीर के नौजवानों ने ग़ज़ब की हिम्मत और सब्र का मुज़ाहिरा किया। आज भी हजारों स्टूडेंट्स आला तालीम हासिल कर रहे हैं, सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रहे हैं, प्रोफेशनल कोर्सेज़ में दाखिला ले रहे हैं और एक बेहतर मुस्तकबिल का ख्वाब देख रहे हैं। उनकी यह जद्दोजहद साबित करती है कि तरक़्क़ी की चाहत दहशत के साए से कहीं ज़्यादा मजबूत होती है।

आतंकवाद का असर कश्मीर की मआशी हालत पर भी बहुत संगीन रहा है। कश्मीर की इकॉनमी काफी हद तक टूरिज़्म, हैंडीक्राफ्ट, ज़िराअत और छोटे कारोबारों पर मुनहसिर करती है। जब भी हिंसा बढ़ती है, सबसे पहला असर सैर-सपाटे पर पड़ता है। होटल सूने हो जाते हैं, बाज़ारों में ग्राहकों की कमी आ जाती है और हजारों खानदान जो टूरिज़्म से जुड़े होते हैं, उन्हें माली परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दुनिया भर में मशहूर कश्मीरी कालीन, पश्मीना शॉल, लकड़ी की नक़्क़ाशी और दस्तकारी से जुड़े कारीगर भी नुकसान झेलते हैं, क्योंकि बेअमनी कारोबार और सफर को प्रभावित करती है। वादी के बहुत से लोगों के लिए अमन ही रोज़गार, तरक़्क़ी और इज़्ज़तदार ज़िंदगी की बुनियाद है। एक पुरअमन कश्मीर का मतलब है ज्यादा सैलानी, बेहतर कारोबार, मजबूत तालीम और नौजवानों के लिए ज्यादा मौके।

सरहद पार से प्रायोजित आतंकवाद ने बार-बार Jammu and Kashmir में अमन और स्थिरता को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की है। दहशतगर्द गिरोहों ने आम नागरिकों और सिक्योरिटी फोर्सेज़ दोनों को निशाना बनाया, ताकि इलाके में खौफ़ और अस्थिरता फैलाई जा सके। ऐसे हमले सिर्फ मुल्क की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं होते, बल्कि इलाके की समाजी और मआशी तरक़्क़ी को भी नुकसान पहुँचाते हैं। आतंकवाद लोगों को बाँटने, भरोसा तोड़ने और बेयक़ीनी फैलाने की कोशिश करता है। मगर इन तमाम कोशिशों के बावजूद कश्मीर के लोगों ने हर मुश्किल घड़ी में हिम्मत और सब्र का मुज़ाहिरा किया है।

Indian Army, सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज़ और Jammu and Kashmir Police ने जम्मू-कश्मीर में अमन और स्थिरता कायम रखने में बेहद अहम किरदार निभाया है। हजारों बहादुर फौजी, पुलिस जवान और सिक्योरिटी एजेंसियों के अफसर आतंकवाद से लड़ते हुए और मासूम लोगों की हिफाज़त करते हुए अपनी जान कुर्बान कर चुके हैं। उनकी बहादुरी मुल्क के अमन, एकता और इंसानियत की हिफाज़त के अटूट इरादे की मिसाल है। इनके साथ-साथ कई आम नागरिक भी आतंकवाद का शिकार बने। उनकी कुर्बानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि दहशतगर्दी सिर्फ इंसानों पर हमला नहीं करती, बल्कि इंसानियत, जम्हूरियत और पुरअमन सह-अस्तित्व के ख्वाब पर भी हमला करती है।

लेकिन कश्मीर की कहानी सिर्फ दर्द और तकलीफ़ की कहानी नहीं है; यह उम्मीद, सब्र और नई शुरुआत की कहानी भी है। पिछले कुछ सालों में वादी में टूरिज़्म, इंफ्रास्ट्रक्चर, तालीम, कारोबार और स्पोर्ट्स के मैदान में कई मुस्बत तब्दीलियाँ देखने को मिली हैं। नौजवान अब टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप्स, इनोवेशन और प्रोफेशनल करियर की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। बहुत से कश्मीरी युवा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए दुनिया को कश्मीर की असली तहज़ीब, मेहमाननवाज़ी और खूबसूरती दिखा रहे हैं, ताकि आतंकवाद उनकी पहचान न बन सके। हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों से सैलानी बड़ी तादाद में दोबारा कश्मीर आ रहे हैं, जिससे न सिर्फ इकॉनमी मजबूत हो रही है बल्कि वादी और बाकी मुल्क के दरमियान जज़्बाती रिश्ते भी मजबूत हो रहे हैं।

कश्मीर की नई नस्ल अमन, स्थिरता और मौके चाहती है। वे चाहते हैं कि स्कूल हमेशा खुले रहें, कारोबार फले-फूले, सैलानी लौटें और लोग बिना डर के जी सकें। सबसे अहम बात यह है कि वे अपनी पहचान तालीम, हुनर, तहज़ीब और मेहमाननवाज़ी से बनाना चाहते हैं — ना कि संघर्ष और हिंसा से। यही सोच आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत जवाब है। हिंसा कुछ वक्त के लिए डर पैदा कर सकती है, मगर इंसान के दिल में मौजूद अमन और तरक़्क़ी की चाहत को कभी शिकस्त नहीं दे सकती।

तालीमी इदारे, खानदान, मीडिया और समाजी रहनुमा सबकी जिम्मेदारी है कि वे इंतिहापसंदी को रोकने और हमआहंगी को बढ़ावा देने में अपना किरदार निभाएँ। स्कूलों और कॉलेजों को चाहिए कि वे सहनशीलता, रहमदिली, क़ौमी एकता और बेहतर सोच जैसी क़ीमतों को बढ़ावा दें। मीडिया को चाहिए कि वह हिंसा को सनसनी बनाने के बजाय तरक़्क़ी, उम्मीद और बहाली की कहानियाँ सामने लाए। पूरे समाज को हर उस सोच को ठुकराना होगा जो नफ़रत और तफरक़ा फैलाती है। आतंकवाद के खिलाफ जंग सिर्फ सिक्योरिटी का मामला नहीं, बल्कि हर नागरिक की समाजी और अख़लाक़ी जिम्मेदारी भी है।

एंटी-टेररिज़्म डे के मौके पर यह याद रखना बेहद जरूरी है कि आतंकवाद ने सिर्फ Jammu and Kashmir ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क को गहरा दर्द दिया है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आतंकवाद लोगों के हौसले को तोड़ने में नाकाम रहा है। आम नागरिकों, स्टूडेंट्स, उस्तादों, कारोबारियों और सिक्योरिटी फोर्सेज़ ने जिस हिम्मत का मुज़ाहिरा किया है, वह साबित करता है कि उम्मीद हमेशा डर से ज्यादा ताकतवर होती है। कश्मीर का मुस्तकबिल हिंसा में नहीं, बल्कि अमन, तरक़्क़ी, तालीम, सैर-सपाटे और खुशहाली में है।

आतंकवाद के खिलाफ असली कामयाबी सिर्फ सिक्योरिटी ऑपरेशन्स से नहीं मापी जाएगी, बल्कि उस दिन से मापी जाएगी जब कश्मीर का हर बच्चा बिना डर के तालीम हासिल कर सके, हर खानदान अमन से जी सके और हर नौजवान खुलकर अपने मुस्तकबिल के ख्वाब देख सके। कश्मीर इस बात का हकदार है कि उसे उसकी खूबसूरती, तहज़ीब, मेहमाननवाज़ी और इंसानी गर्मजोशी के लिए जाना जाए — ना कि उस दहशत की वजह से जिसने लंबे अरसे तक इस वादी को परेशान रखा।

इस एंटी-टेररिज़्म डे पर पूरे मुल्क के लिए पैगाम साफ है: आतंकवाद तबाही और खौफ़ फैला सकता है, मगर वह कभी भी एकता, सब्र, हिम्मत और अमन पर यक़ीन रखने वाले लोगों के इरादों को शिकस्त नहीं दे सकता। Jammu and Kashmir आज सिर्फ आतंकवाद से हुए दर्द की निशानी नहीं, बल्कि हौसले, उम्मीद और हिंदुस्तान की अटूट रूह की भी मजबूत मिसाल बनकर खड़ा है।

आतंकवाद के खिलाफ जम्मू-कश्मीर में चल रहे सामाजिक बदलाव और युवाओं की भूमिका पर अधिक जानकारी के लिए यह भी पढ़ें www.jkblue.info

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