पाकिस्तान में सियासत और दहशतगर्दी का गठजोड़ बेनक़ाब


इस्लामाबाद से आने वाली ताज़ा मालूमात ने एक बार फिर Pakistan की सियासी सूरत-ए-हाल पर गंभीर सवालात खड़े कर दिए हैं। दावा तो ये किया जाता है कि मुल्क दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहा है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी बयान करती नज़र आ रही है।

मिलने वाली तस्वीरों और रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब असेंबली के स्पीकर मलिक अहमद ख़ान की मुलाक़ात लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े अफ़राद के साथ हुई। इन अफ़राद में सैफ़ुल्लाह कसूरी, याक़ूब शेख़ और राना अशफ़ाक जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। ये मुलाक़ात सिर्फ़ एक रस्मी ताज़ियत नहीं लगती, बल्कि इससे सियासत और दहशतगर्द तन्ज़ीमों के दरमियान गहरे ताल्लुक़ात का शक और मज़बूत हो जाता है।

हैरानी की बात ये है कि पाकिस्तान की हुकूमत बार-बार दुनिया के सामने ये दावा करती है कि वो दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ सख़्त क़दम उठा रही है। लेकिन जब ऐसे वाक़ियात सामने आते हैं, तो ये सवाल उठना लाज़मी है कि आख़िर ये “दोहरा मयार” क्यों अपनाया जा रहा है।

माहिरीन का कहना है कि सियासी तबक़ा अंदरूनी तौर पर इन गिरोहों को सहारा देता है,बाहरी दुनिया के सामने मुख़्तलिफ़ नैरेटिव पेश किया जाता है, दहशतगर्द तन्ज़ीमों को “स्ट्रैटेजिक एसेट” के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है

ये रवैया ना सिर्फ़ ख़िते की अमन-ओ-अमान के लिए ख़तरा है, बल्कि पाकिस्तान की साख को भी लगातार नुक़सान पहुंचा रहा है।

आलमी बिरादरी को अब इस मसले पर ज़्यादा सख़्ती से गौर करना होगा, क्योंकि अगर सियासतदान और दहशतगर्द एक ही सफ़ में खड़े नज़र आएं, तो फिर दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ जंग महज़ एक नारा बनकर रह जाती है।

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