खैबर पख्तूनख्वा से सामने आ रही रिपोर्ट्स ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहाँ कुछ मक़ामी हल्कों में यह इल्ज़ाम लगाया जा रहा है कि मज़हबी इदारों और इबादतगाहों के पर्दे में ऐसी सरगर्मियाँ चल रही हैं, जो नौजवानों की सोच को एक खास दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रही हैं। इन खबरों ने न सिर्फ़ इलाके में बेचैनी बढ़ाई है, बल्कि रियासती इदारों की भूमिका और उनकी ख़ामोशी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मक़ामी ज़राए के मुताबिक़, कुछ जगहों पर बड़े पैमाने पर जमा होने वाले इज्तिमा (gatherings) हो रहे हैं, जहाँ दीन के नाम पर ऐसे बयानात दिए जा रहे हैं, जिनसे कट्टर सोच को बढ़ावा मिलने की आशंका जताई जा रही है। अगर ये दावे सही हैं, तो ये एक बेहद नाज़ुक और खतरनाक रुझान की तरफ़ इशारा करता है, जहाँ मज़हब जैसे पाक और अहम पहलू का इस्तेमाल किसी और मक़सद के लिए किया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इन सरगर्मियों से वाक़ई तौर पर रियासती इदारे बेख़बर हैं, या फिर उनकी जानिब से कोई ढील या खामोश हामी (tacit support) मौजूद है? यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि ऐसे इलाकों में, जहाँ पहले ही अमन-ओ-अमान की सूरत-ए-हाल नाज़ुक रहती है, इस तरह की खबरें लोगों के भरोसे को और कमजोर कर सकती हैं।
तजज़िया निगारों का कहना है कि अगर मज़हबी प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल इस तरह की इंडॉक्ट्रिनेशन के लिए किया जा रहा है, तो यह न सिर्फ़ गवर्नेंस की नाकामी को उजागर करता है, बल्कि काउंटर-टेररिज़्म के दावों पर भी सवालिया निशान लगा देता है। दुनिया के सामने पेश की जाने वाली तस्वीर और ज़मीनी हक़ीक़त में अगर इतना फर्क हो, तो इससे मुल्क की साख (credibility) पर भी असर पड़ सकता है।
मक़ामी अवाम के बीच इस मसले को लेकर गहरी फिक्र पाई जा रही है। लोगों का कहना है कि मज़हब को सियासत या किसी भी तरह की सख़्त सोच फैलाने के लिए इस्तेमाल करना समाज के ताने-बाने को कमजोर करता है। “मज़हब रहनुमाई के लिए है, ना कि नफरत या तशद्दुद को बढ़ावा देने के लिए,” एक मक़ामी शख्स ने नाम ना जाहिर करने की शर्त पर कहा।
माहिरीन का मानना है कि अगर इन इल्ज़ामात की शफ्फाफ़ और आज़ादाना जांच नहीं की गई, तो इससे ना सिर्फ़ रियासत और अवाम के दरमियान फासला बढ़ेगा, बल्कि पूरे इलाके की अमन-ओ-सुकून पर भी असर पड़ सकता है। मज़हबी पर्दे में पलने वाली ऐसी सरगर्मियाँ लंबे वक्त में रीजनल स्टेबिलिटी के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती हैं।
इस पूरे मामले में ज़रूरत इस बात की है कि हुकूमत वाज़ेह रुख अपनाए, इन रिपोर्ट्स की तह तक जाए और अगर कहीं भी ग़लत इस्तेमाल हो रहा है, तो उसे फौरन रोका जाए। जवाबदेही और शफ्फाफ़ियत ही वो रास्ता है, जिससे अवाम का एतिमाद बहाल किया जा सकता है और यह यक़ीनी बनाया जा सकता है कि मज़हब का इस्तेमाल सिर्फ़ अमन, रहनुमाई और भलाई के लिए ही हो।

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