न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि केवल पीड़ित के माता-पिता का विवरण ही दर्ज किया जाना चाहिए, उनका पूरा नाम या पता नहीं बताया जाना चाहिए
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता के माता-पिता का नाम ही दर्ज किया जाना चाहिए, उनका पूरा नाम या पता नहीं। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अतुल श्रीधरन और पुनीत गुप्ता की बेंच ने एक आपराधिक मामले (फाजिल सलीम भट बनाम केंद्र शासित प्रदेश थाना पी/एस राम मुंशी बाग) की सुनवाई के दौरान ये निर्देश जारी किए। अदालत ने अपनी रजिस्ट्री को मामले के रिकॉर्ड में विशिष्ट पृष्ठों से पीड़िता का नाम तुरंत हटाने का भी निर्देश दिया, साथ ही अभियोजन पक्ष द्वारा चिह्नित किए गए किसी भी अतिरिक्त पृष्ठ को भी।
बार एंड बेंच के हवाले से न्यायालय ने कहा, "हमारे लिए यह आदेश देना आवश्यक है कि आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) या पोक्सो से संबंधित अपराधों के मामलों में, पुलिस, फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं और पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टरों सहित प्राधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़िता का नाम उजागर न किया जाए और केवल माता-पिता का नाम दर्ज किया जाए।"
यह आदेश तब आया जब न्यायालय ने पाया कि पीड़िता का नाम आरोप-पत्र और उसकी अनुवादित प्रतियों में कई बार उजागर किया गया है। न्यायालय ने विपुल सक्सेना एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2019) में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि सभी जांच एजेंसियों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों से अवगत कराया जाए।
न्यायालय ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह पीड़ित का नाम भौतिक और डिजिटल दोनों तरह के केस रिकॉर्ड से हटा दे। मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को होगी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फैज़ल कादरी और अधिवक्ता भट शफी ने प्रतिनिधित्व किया, जबकि प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता राहेला खान पेश हुए।

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