इंसानियत की खिदमत में बिलक़ीस आरा का बड़ा किरदार, 43 बार रक्तदान कर बनीं “ब्लड वुमन ऑफ कश्मीर”


कश्मीर के हंदवाड़ा इलाके की रहने वाली बिलक़ीस आरा ने इंसानियत और समाजी खिदमत की एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो इलाके के नौजवानों और खासकर महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। एक आशा वर्कर (ASHA Worker) के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ बिलक़ीस आरा ने साल 2012 से अब तक 43 मर्तबा रक्तदान किया है। उनकी इसी लगातार समाजी खिदमत और इंसानी जज़्बे की वजह से उन्हें “ब्लड वुमन ऑफ कश्मीर” के तौर पर पहचान मिली है।

बिलक़ीस आरा का कहना है कि रक्तदान उनके लिए सिर्फ एक समाजी काम नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद की जिंदगी बचाने का एक जरिया है। वह अपने आसपास के लोगों को भी लगातार रक्तदान के लिए आगे आने की तरगीब देती रही हैं। उनके मुताबिक, किसी मरीज को खून की जरूरत के वक्त यह मायने नहीं रखता कि वह किस मजहब, बिरादरी या तबके से ताल्लुक रखता है। जरूरत के वक्त इंसान की मदद करना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

बिलक़ीस आरा ने 2012 में रक्तदान की शुरुआत की और इसके बाद यह सिलसिला लगातार जारी रखा। अब तक 43 बार रक्तदान करना अपने आप में उनकी प्रतिबद्धता और जज़्बे को जाहिर करता है। आम तौर पर कई लोग रक्तदान को लेकर झिझक महसूस करते हैं, लेकिन बिलक़ीस ने इसे अपनी समाजी जिम्मेदारी का हिस्सा बना लिया।

एक आशा वर्कर होने की वजह से उनका लोगों और स्थानीय समुदाय के साथ लगातार संपर्क रहता है। इसी दौरान वह जरूरतमंद मरीजों और उनके परिवारों की मुश्किलात को करीब से देखती हैं। यही तजुर्बा उन्हें रक्तदान और दूसरों को इसके लिए तैयार करने की तरफ लगातार आगे बढ़ाता रहा।

बिलक़ीस आरा की समाजी खिदमत का एक अहम पहलू यह भी है कि वह मजहब और समुदाय की बुनियाद पर फर्क किए बगैर लोगों की मदद करने पर जोर देती हैं। उनके लिए रक्तदान का मकसद सिर्फ किसी एक तबके की मदद करना नहीं, बल्कि हर उस शख्स तक पहुंचना है जिसे जिंदगी बचाने के लिए खून की जरूरत हो।

उनकी यह सोच कश्मीर के समाज में मौजूद आपसी मदद और इंसानी हमदर्दी की रिवायत को भी सामने लाती है। मुश्किल वक्त में एक-दूसरे के काम आना और जरूरतमंद के लिए आगे बढ़ना कश्मीरी समाज की पुरानी रवायतों में शामिल रहा है।

बिलक़ीस आरा की कहानी खास तौर पर कश्मीर की महिलाओं के बढ़ते समाजी किरदार को उजागर करती है। घरेलू और पेशेवर जिम्मेदारियों के साथ समाजी खिदमत के मैदान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी अब कई इलाकों में देखने को मिल रही है। बिलक़ीस का सफर इसी बदलाव की एक सकारात्मक तस्वीर पेश करता है।

उनका लगातार रक्तदान यह पैगाम देता है कि समाजी बदलाव के लिए हमेशा बड़े ओहदे या बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। एक आम नागरिक भी अपनी क्षमता के मुताबिक किसी की जिंदगी बचाने में अहम किरदार अदा कर सकता है।

बिलक़ीस आरा खुद रक्तदान करने के साथ-साथ दूसरों को भी इसके लिए मोटिवेट करती हैं। उनका मानना है कि अगर ज्यादा से ज्यादा लोग नियमित तौर पर रक्तदान के लिए आगे आएं, तो इमरजेंसी के वक्त मरीजों और उनके परिवारों को खून की तलाश में कम परेशान होना पड़ेगा।

खास तौर पर नौजवानों से उनकी अपील रहती है कि वह समाजी जिम्मेदारी को समझें और जरूरत के वक्त अपने खून का एक हिस्सा किसी की जिंदगी बचाने के लिए दें। उनका मानना है कि एक यूनिट खून किसी परिवार के लिए उम्मीद की एक नई किरण बन सकता है।

हंदवाड़ा की बिलक़ीस आरा की कहानी कश्मीर में समाजी खिदमत, हमदर्दी और इंसानी जिम्मेदारी की एक सकारात्मक मिसाल के तौर पर सामने आती है। 43 बार रक्तदान करने और दूसरों को भी इस नेक काम के लिए प्रेरित करने का उनका सफर बताता है कि लगातार छोटी-छोटी कोशिशें समाज पर बड़ा असर डाल सकती हैं।

“ब्लड वुमन ऑफ कश्मीर” के तौर पर मिली पहचान सिर्फ बिलक़ीस आरा की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन तमाम महिलाओं और समाजी कार्यकर्ताओं के लिए भी हौसला है जो बिना किसी भेदभाव के लोगों की खिदमत में लगे हुए हैं। उनकी कहानी यही पैगाम देती है कि इंसानियत की कोई सरहद नहीं होती और किसी की जिंदगी बचाने से बड़ी समाजी खिदमत शायद ही कोई हो।

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