उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के उड़ी सेक्टर में नियंत्रण रेखा (LoC) के नजदीक स्थित चुरांडा गांव में भारतीय सेना के सहयोग से संचालित सिलाई केंद्र स्थानीय लड़कियों के लिए हुनर और आत्मनिर्भरता की नई राह खोल रहा है। इस केंद्र में करीब 17 लड़कियां सिलाई और कपड़ों की कटाई का प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं। सीमावर्ती इलाके में रहने वाली इन युवतियों के लिए यह पहल अपने हुनर को निखारने और भविष्य में आजीविका के नए रास्ते तलाशने का एक महत्वपूर्ण अवसर बन रही है।
इस प्रशिक्षण केंद्र में स्थानीय प्रशिक्षिका साइमा लड़कियों को सिलाई और टेलरिंग का हुनर सिखा रही हैं। प्रशिक्षण के दौरान युवतियां कपड़ों की सिलाई और उससे जुड़े जरूरी काम सीख रही हैं, ताकि वे इस हुनर को अपने जीवन में इस्तेमाल कर सकें। इस पहल का खास मकसद ऐसी व्यावहारिक दक्षता विकसित करना है, जिसके सहारे लड़कियां अपने घर से ही काम शुरू करने की संभावना तलाश सकें।
चुरांडा जैसे दूरदराज और सीमावर्ती गांवों में रोजगार के अवसर सीमित हैं। यहां की लड़कियों के सामने अक्सर शिक्षा और घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ रोजगार के विकल्प तलाशने की चुनौती भी रहती है। ऐसे माहौल में सिलाई जैसे व्यावसायिक हुनर का प्रशिक्षण उनके लिए खास अहमियत रखता है। इससे वे केवल एक नया कौशल ही नहीं सीख रही हैं, बल्कि अपने भविष्य को लेकर नई उम्मीदें भी संजो रही हैं।
प्रशिक्षण प्राप्त कर रही लड़कियों ने उम्मीद जताई है कि पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद वे अपने हुनर के जरिए स्वतंत्र रूप से कमाई कर सकेंगी। घर से सिलाई का काम शुरू करने की संभावना उन्हें परिवार की आर्थिक जरूरतों में सहयोग देने और अपनी पहचान बनाने का अवसर दे सकती है। हालांकि, वास्तविक आमदनी उनके कौशल, काम की उपलब्धता और स्थानीय मांग पर निर्भर करेगी।
महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण किसी भी समाज की तरक्की का अहम हिस्सा है। जब लड़कियों को हुनर सीखने और अपनी क्षमता को पहचानने का अवसर मिलता है, तो इसका सकारात्मक असर उनके परिवार और पूरे समुदाय पर पड़ सकता है। खासकर सीमावर्ती इलाकों में ऐसी प्रशिक्षण पहलें स्थानीय युवतियों को रोजगार से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी और आत्मविश्वास हासिल करने में मदद करती हैं।
भारतीय सेना के सहयोग से चल रही चुरांडा की यह पहल भी इसी दिशा में एक प्रयास है। सेना की ओर से स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर शिक्षा, कौशल विकास और आजीविका से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देना सीमावर्ती क्षेत्रों के सामाजिक विकास में सहयोगी हो सकता है।
कश्मीर की बेटियों में हुनर और मेहनत की कोई कमी नहीं है। जरूरत है तो उन्हें सही अवसर और मार्गदर्शन उपलब्ध कराने की। चुरांडा की ये 17 लड़कियां इस बात की मिसाल हैं कि छोटे गांवों में भी बड़े सपने पल सकते हैं। सिलाई का यह प्रशिक्षण उनके लिए आत्मनिर्भरता की ओर एक शुरुआती कदम है और उम्मीद है कि सीखा हुआ हुनर आने वाले समय में उनके बेहतर भविष्य का आधार बनेगा।


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