सरकार की ओर से 5 अक्टूबर 2026 को जारी S.O. 251 के जरिए स्कूल एजुकेशन रूल्स में यह संशोधन किया गया है। नए प्रावधानों का मकसद निजी शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना के रास्ते में आने वाली गैर-जरूरी प्रक्रियाओं को कम करना और शिक्षा के क्षेत्र में नए संस्थानों के लिए माहौल को आसान बनाना बताया जा रहा है।
नए बदलाव के तहत प्राइवेट स्कूल खोलने के लिए पहले जिन कई तरह के परमिशन और NOC की जरूरत पड़ती थी, उनमें से कुछ शर्तों को अब खत्म कर दिया गया है। इनमें म्युनिसिपल NOC जैसी शर्त भी शामिल है। इसके अलावा स्कूल परिसर में निश्चित आकार का खेल मैदान या इंडोर गेम्स रूम रखने से संबंधित तय मानकों में भी बदलाव किया गया है। इससे खास तौर पर उन इलाकों में स्कूल शुरू करने की राह आसान हो सकती है, जहां जमीन की कमी या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बड़े खेल मैदान की व्यवस्था करना मुश्किल होता है।
हालांकि, नियमों में आसानी के साथ स्कूलों की सुरक्षा जिम्मेदारी को कम नहीं किया गया है। नए सिस्टम के तहत स्कूल प्रबंधन को कई अहम सुरक्षा मानकों के संबंध में सेल्फ-अटेस्टेड सर्टिफिकेट देना होगा। इसमें ट्रैफिक सेफ्टी, बिल्डिंग सेफ्टी, फायर सेफ्टी और प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स को सुरक्षित तरीके से रखने से संबंधित प्रमाणपत्र शामिल हैं।
यानी अब कई मामलों में सरकारी दफ्तरों से अलग-अलग NOC हासिल करने की लंबी कवायद के बजाय स्कूल प्रबंधन को खुद यह तस्दीक करनी होगी कि उसका संस्थान निर्धारित सुरक्षा मानकों पर पूरा उतरता है। यह बदलाव प्रशासनिक प्रक्रिया को छोटा जरूर करता है, लेकिन साथ ही स्कूल संचालकों पर जिम्मेदारी भी डालता है कि वे दी गई जानकारी और सुरक्षा प्रमाणपत्रों में पूरी सच्चाई और सावधानी बरतें।
कश्मीर में इस बदलाव को खास अहमियत के साथ देखा जा सकता है। घाटी के कई इलाकों में निजी स्कूलों की मांग लगातार बनी रहती है और अभिभावक अपने बच्चों के लिए बेहतर और नजदीकी शिक्षा संस्थानों की तलाश में रहते हैं। ऐसे में स्कूल खोलने की प्रक्रिया सरल होने से शिक्षा क्षेत्र में नए संस्थानों और निवेश के लिए गुंजाइश पैदा हो सकती है।
दूरदराज के इलाकों में इसका असर और भी अहम हो सकता है, जहां सरकारी स्कूलों के अलावा निजी शिक्षा के विकल्प सीमित हैं। अगर नए संस्थान स्थापित होते हैं तो स्थानीय बच्चों को अपने इलाकों में ही बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है। साथ ही इससे शिक्षकों और दूसरे स्टाफ के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
लेकिन इस पूरी कवायद में सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा और जवाबदेही का रहेगा। स्कूल महज एक इमारत नहीं, बल्कि बच्चों की अमानत होता है। इसलिए ट्रैफिक, भवन, आग से बचाव और लैब केमिकल्स की सुरक्षा से जुड़े सेल्फ-सर्टिफिकेशन को महज कागजी कार्रवाई नहीं समझा जाना चाहिए। स्कूल प्रबंधन की तरफ से दी गई तस्दीक में किसी भी तरह की लापरवाही बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
सरकार का यह कदम एक तरफ प्राइवेट स्कूल खोलने की राह को छोटा करता है, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा की जिम्मेदारी को स्कूल प्रबंधन के कंधों पर ज्यादा स्पष्ट रूप से रखता है। अब आने वाले दिनों में इसकी कामयाबी इस बात से तय होगी कि आसान किए गए नियमों के साथ सुरक्षा मानकों की निगरानी और जवाबदेही को किस तरह बरकरार रखा जाता है।


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