ज़ाहिद रफीक कोटा ने हिमालय के कई अहम पहाड़ी इलाकों में सफर करते हुए ऐसी झीलों तक पहुंचने की कोशिश की है, जो ऊंचे पहाड़ों, दुर्गम रास्तों और कठिन भौगोलिक हालात के बीच मौजूद हैं। उनकी खोज का दायरा पीर पंजाल, कश्मीर हिमालय, किश्तवाड़, ज़ांस्कर, लद्दाख और काराकोरम की पहाड़ी रेंजों तक फैला हुआ है। इन इलाकों में ट्रेकिंग करना केवल शारीरिक ताकत का मामला नहीं, बल्कि रास्तों की समझ, मौसम का अंदाजा, पहाड़ी माहौल से वाकिफियत और मुश्किल हालात में सही फैसला लेने की सलाहियत भी मांगता है।
हिमालय की अल्पाइन झीलें अपनी बेमिसाल खूबसूरती, साफ पानी और चारों तरफ फैले पहाड़ों की वजह से कुदरत का एक अनमोल तोहफा मानी जाती हैं। इनमें से कई झीलें ऐसे दूरदराज इलाकों में स्थित हैं, जहां पहुंचने के लिए कई घंटों या कभी-कभी कई दिनों तक पैदल सफर करना पड़ता है। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, अचानक बदलता मौसम, बर्फ से ढके रास्ते और कठिन चढ़ाइयां ऐसे सफर को और भी चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। इन हालात के बावजूद 200 से ज्यादा झीलों तक पहुंचना ज़ाहिद की पहाड़ों के साथ गहरी दिलचस्पी और लगातार कोशिशों को जाहिर करता है।
झीलों की खोज के अलावा ज़ाहिद कई अहम चोटियों को भी सर कर चुके हैं। इनमें माउंट ताताकूटी, माउंट लोहारकुट, माउंट हरमुख और कत्सल पीक शामिल हैं। इन चोटियों पर पहुंचने का तजुर्बा उनके पर्वतारोहण के सफर को और अहम बनाता है। कश्मीर के पहाड़ों में मौजूद इन बुलंद चोटियों तक पहुंचने के लिए जिस हिम्मत, सब्र और तैयारी की जरूरत होती है, वह किसी भी पर्वतारोही के लिए एक बड़ा इम्तिहान होता है।
ज़ाहिद ने जवाहर इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड विंटर स्पोर्ट्स, पहलगाम से बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स भी पूरा किया है। पर्वतारोहण की यह बुनियादी ट्रेनिंग पहाड़ों में सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ने, जोखिमों को समझने और जरूरी तकनीकी जानकारी हासिल करने में मदद देती है। उनकी यह तालीम इस बात की अहमियत भी सामने लाती है कि पहाड़ों की तरफ रुख करने वाले नौजवान केवल जोश के भरोसे सफर शुरू न करें, बल्कि जरूरी प्रशिक्षण, उपकरणों और सुरक्षा के उसूलों को भी अपनी तैयारी का हिस्सा बनाएं।
ज़ाहिद का सफर ऐसे वक्त में खास अहमियत रखता है, जब कश्मीर में एडवेंचर टूरिज्म और ईको-टूरिज्म के लिए नए मौकों की तलाश की जा रही है। वादी के पहाड़, झीलें, जंगल और प्राकृतिक रास्ते स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए जरिये पैदा कर सकते हैं। जिम्मेदार तरीके से ट्रेकिंग और पर्वतारोहण को बढ़ावा देकर स्थानीय गाइडों, होमस्टे संचालकों और दूसरे छोटे कारोबारियों को भी फायदा पहुंचाया जा सकता है।
हालांकि, पहाड़ों और झीलों की इस खूबसूरती को महफूज रखना भी उतना ही जरूरी है। अल्पाइन झीलों के आसपास प्लास्टिक और दूसरे कचरे को छोड़ना, प्राकृतिक माहौल को नुकसान पहुंचाना और बिना तैयारी के जोखिम भरे रास्तों पर निकलना पर्यावरण और यात्रियों, दोनों के लिए खतरा बन सकता है। ऐसे में ज़ाहिद जैसे खोजी लोगों के अनुभव नौजवानों को यह पैगाम दे सकते हैं कि कुदरत की खूबसूरती का आनंद लेने के साथ उसकी हिफाजत करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
कश्मीर के नौजवानों के लिए ज़ाहिद रफीक कोटा का सफर इस बात की मिसाल है कि अपने इलाके की कुदरती दौलत को समझने और दुनिया के सामने पेश करने के लिए जुनून के साथ इल्म, तालीम और लगातार मेहनत भी जरूरी है। हिमालय की 200 से ज्यादा अल्पाइन झीलों तक पहुंचने का उनका अनुभव कश्मीर की एडवेंचर पहचान को मजबूत करने की सलाहियत रखता है।
उनकी यह कोशिश वादी के उन नौजवानों के लिए खास तौर पर हौसला-अफजाई का सबब बन सकती है, जो पहाड़ों, ट्रेकिंग और प्रकृति की खोज में दिलचस्पी रखते हैं। हिमालय की बुलंदियों और दूरदराज झीलों तक पहुंचने का यह सफर इस पैगाम के साथ आगे बढ़ता है कि कश्मीर की असल खूबसूरती को दुनिया तक पहुंचाने के लिए उसके प्राकृतिक खजानों को जानना, समझना और महफूज रखना बेहद जरूरी है।


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