‘तसरुफदार द जिन्न्स ऑफ कश्मीर’ की बुनियाद कश्मीर की स्थानीय लोक विरासत और उन कहानियों पर टिकी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की यादों का हिस्सा बनती रही हैं। फिल्म लोककथा को महज एक काल्पनिक दास्तान के तौर पर पेश करने के बजाय उसे कश्मीर की सामूहिक याददाश्त, घर से जुड़ाव और बिछड़ने के एहसास के साथ जोड़ती है। यही वजह है कि इसकी कहानी में वादी के सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल की झलक भी दिखाई देती है। कश्मीर की लोककथाओं में मौजूद रहस्य और कल्पना को मानवीय अनुभवों के साथ पिरोकर फिल्म ने एक ऐसा सिनेमाई अंदाज़ तैयार किया है, जो स्थानीय जमीन से गहराई से जुड़ा हुआ महसूस होता है।
फिल्म की इस कामयाबी में कश्मीरी रेडियो जॉकी और फिल्मकार आरजे उमर निसार की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है। उन्होंने परियोजना में सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया। पुरस्कार मिलने के बाद उमर निसार ने फिल्म और उसके सफर से जुड़े अपने विचार साझा किए। रेडियो के जरिए कश्मीर के लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाने वाले उमर निसार का फिल्म निर्माण की दुनिया में आगे बढ़ना इस बात की झलक देता है कि वादी के नौजवान अब रचनात्मक और सिनेमाई मैदान में भी अपनी पहचान बनाने के लिए आगे आ रहे हैं।
आईएफएफजेके के ‘जेएंडके सिलेक्ट’ वर्ग में मिली यह कामयाबी इसलिए भी खास है क्योंकि फिल्म की कहानी का रिश्ता सीधे कश्मीर की अपनी सांस्कृतिक जमीन से है। किसी बाहरी नजरिए से कश्मीर को देखने के बजाय यहां के अनुभवों और लोक स्मृतियों को स्थानीय रचनात्मक सोच के जरिए पर्दे पर लाना क्षेत्रीय सिनेमा के लिए एक अहम कदम माना जा सकता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि वादी की अपनी दास्तानें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिस्पर्धी मंच पर दर्शकों और निर्णायकों का ध्यान खींचने की क्षमता रखती हैं।
कश्मीर में फिल्मों के लिए सिर्फ प्राकृतिक नज़ारे ही आकर्षण का केंद्र नहीं हैं। यहां का समृद्ध लोक साहित्य, संगीत, मौखिक परंपराएं, ऐतिहासिक स्मृतियां और सामाजिक जीवन भी कहानीकारों को विषयों की एक बड़ी दुनिया उपलब्ध कराते हैं। ‘तसरुफदार द जिन्न्स ऑफ कश्मीर’ इसी संभावनाओं को सामने लाने वाली कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है। फिल्म का पुरस्कार जीतना उन युवा रचनाकारों के लिए भी हौसला बढ़ाने वाला है, जो अपनी वादी की अनकही या कम सुनी गई कहानियों को नए अंदाज़ में पेश करना चाहते हैं।
इस सम्मान ने कश्मीर की उभरती फिल्मी सरगर्मियों को एक नई रफ्तार देने की उम्मीद पैदा की है। स्थानीय प्रतिभाओं को जब अपनी ही जमीन की कहानी कहने के लिए मंच मिलता है तो उससे सिर्फ एक फिल्म की कामयाबी नहीं होती, बल्कि पूरी रचनात्मक बिरादरी का हौसला बढ़ता है। ‘तसरुफदार द जिन्न्स ऑफ कश्मीर’ का सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब इसी बदलती तस्वीर की एक खूबसूरत मिसाल है—जहां कश्मीर अपनी लोक विरासत, अपनी यादों और अपनी दास्तानों को अब अपनी आवाज में दुनिया के सामने रख रहा है।


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