नशे के शिकार लोगों के लिए नई उम्मीद, जम्मू-कश्मीर में पुनर्वास से रोज़गार तक तीन साल की पहल


जम्मू-कश्मीर में नशे की समस्या से निपटने के लिए अब सिर्फ अस्पताल में इलाज तक सीमित रहने के बजाय मरीज की लंबी अवधि की सेहत, तालीम, हुनर और रोज़गार पर भी तवज्जो दी जाएगी। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने नशे के शिकार लोगों के पुनर्वास और सामाजिक-आर्थिक पुनर्समावेशन योजना, 2026 को अधिसूचित किया है। तीन साल की यह मरीज-केंद्रित व्यवस्था इस सोच को आगे बढ़ाती है कि नशे की लत से निजात महज़ कुछ दिनों के इलाज का मामला नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली रिकवरी का सफर है। इस पहल में अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी मरीज को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उसकी दोबारा सामान्य जिंदगी में वापसी के लिए लगातार मदद और निगरानी का इंतज़ाम किया जाएगा।

नई योजना के तहत समाज कल्याण विभाग का केस मैनेजर मरीज की रिकवरी के बाद की यात्रा में अहम किरदार निभाएगा। केस मैनेजर यह देखने में मदद करेगा कि संबंधित व्यक्ति अपनी तालीम जारी रख पा रहा है या नहीं, किसी हुनर को सीख रहा है या नहीं और रोज़गार हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है या नहीं। इसके साथ ही मरीज की स्थिति की समय-समय पर जानकारी ली जाएगी। योजना में तीन, छह, 12 और 24 महीने पर फॉलो-अप और चेक-इन का प्रावधान किया गया है। इसका मकसद सिर्फ यह जानना नहीं होगा कि मरीज दोबारा नशे की तरफ गया या नहीं, बल्कि यह समझना भी होगा कि उसके सामने सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक स्तर पर कौन-सी मुश्किलें आ रही हैं और उन्हें दूर करने के लिए किस तरह की मदद की जरूरत है।

इस नीति की सबसे अहम बात यह है कि दोबारा नशे की ओर लौटने यानी रिलैप्स को सज़ा का नहीं, सेहत का मसला माना जाएगा। यह नजरिया नशे से जूझ रहे लोगों के लिए खास मायने रखता है, क्योंकि कई बार डर, शर्म या सामाजिक दबाव की वजह से लोग दोबारा इलाज लेने से कतराते हैं। नई व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे लोगों को हौसला देना और उन्हें फिर से रिकवरी के रास्ते पर लाना है। यानी अगर कोई व्यक्ति इलाज के बाद लड़खड़ाता है तो उसे नाकाम करार देकर किनारे नहीं किया जाएगा, बल्कि उसकी मदद दोबारा की जाएगी। यह सोच परिवारों के लिए भी एक उम्मीद पैदा करती है कि उनके अपने, जिन्हें नशे की गिरफ्त ने जिंदगी से दूर कर दिया है, उन्हें वापस समाज की मुख्यधारा में लाने का रास्ता खुला है।

इस दिशा में श्रीनगर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (आईएमएचएएनएस) में नया केंद्र शुरू किया गया है, जबकि जम्मू, कठुआ और बडगाम में भी इस व्यवस्था के पायलट चरण शुरू किए जाने हैं। इससे वादी के अलग-अलग इलाकों में नशा मुक्ति और पुनर्वास सेवाओं को और मजबूत करने की उम्मीद है। खास तौर पर कश्मीर के नौजवानों के लिए यह पहल अहम मानी जा रही है, क्योंकि नशे के खिलाफ लड़ाई में इलाज के साथ-साथ शिक्षा, हुनर, रोज़गार और परिवार का सहारा भी बेहद जरूरी है।

जम्मू-कश्मीर की यह पहल नशा मुक्ति के पुराने सीमित नजरिए से आगे बढ़कर लंबी अवधि की सामाजिक और आर्थिक वापसी पर जोर देती है। एक सप्ताह या कुछ दिनों के डिटॉक्स के बाद मरीज को घर भेज देना अंतिम मंजिल नहीं है; असल काम उसके बाद शुरू होता है। जब किसी नौजवान को दोबारा पढ़ाई, हुनर और रोज़गार से जोड़ा जाता है तो उसे अपनी जिंदगी को नए सिरे से संवारने का मकसद मिलता है। यही वजह है कि यह योजना सिर्फ मरीज के इलाज तक सीमित नहीं, बल्कि उसके परिवार और पूरे समाज को जोड़ने वाली कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है।

कश्मीर की अवाम के लिए इस पहल का सबसे बड़ा पैगाम यही है कि नशे की गिरफ्त से बाहर निकलना मुमकिन है और रिकवरी को एक लंबा, मगर उम्मीद भरा सफर समझना होगा। वालिदैन, शिक्षक, पंचायतें, युवा संगठन और समाज के जिम्मेदार लोग अगर ऐसे युवाओं का हौसला बढ़ाएं और उन्हें ताने देने के बजाय हुनर व रोज़गार के रास्ते से जोड़ें, तो नशामुक्त समाज की बुनियाद और मजबूत हो सकती है। जम्मू-कश्मीर में तीन साल तक मरीज के साथ चलने वाली यह व्यवस्था इसी सोच को आगे बढ़ाती है कि हर शख्स को दूसरी शुरुआत का मौका मिलना चाहिए।

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