यह बात उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वाडीज हिंदी शिक्षा समिति की ओर से जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषाओं की अकादमी के सहयोग से आयोजित मेधावी विद्यार्थियों के सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए कही। कार्यक्रम में विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों के साथ-साथ आर्मी गुडविल स्कूलों और केंद्रीय विद्यालयों के छात्र भी मौजूद रहे। मेधावी विद्यार्थियों की हौसला-अफजाई करते हुए उपराज्यपाल ने उनकी मेहनत और कामयाबी को सराहा तथा उन्हें अपने इलाकों और समाज के लिए मिसाल बनने का पैगाम दिया।
उपराज्यपाल ने खास तौर पर जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले बच्चों की तालीम और तरक्की को अहमियत देने की बात कही। उन्होंने कहा कि सरहद के करीब बसे गांवों के बच्चों के लिए यह जरूरी है कि उन्हें ऐसी शिक्षा और तकनीकी सुविधाएं मिलें, जिनकी मदद से वे अपने गांव से ही दुनिया के बदलते अवसरों से जुड़ सकें। आज के दौर में तकनीक ने भौगोलिक दूरियों को काफी हद तक कम कर दिया है। ऐसे में दूरदराज और सरहदी इलाकों के बच्चों को भी डिजिटल शिक्षा, आधुनिक कौशल और नई तकनीकों से जोड़ना वक्त की जरूरत है।
एलजी सिन्हा ने युवाओं के सशक्तीकरण के लिए पांच अहम क्षेत्रों पर खास तवज्जो देने की जरूरत बताई। इनमें शिक्षा और तकनीक, रोजगार एवं उद्यमिता, खेल और संस्कृति, अवसरों तक पहुंच तथा मार्गदर्शन और मेंटरशिप शामिल हैं। इन क्षेत्रों को मजबूत बनाकर सीमावर्ती क्षेत्रों के नौजवानों के लिए तरक्की के नए रास्ते खोले जा सकते हैं।
रोजगार और उद्यमिता को लेकर भी उन्होंने युवाओं को सिर्फ नौकरी तलाशने तक सीमित न रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि नई सोच, हुनर और तकनीकी जानकारी के जरिए युवा अपने लिए रोजगार के नए साधन पैदा कर सकते हैं। खासकर सीमावर्ती गांवों में रहने वाले नौजवानों के लिए स्थानीय स्तर पर उद्यमिता के अवसर विकसित किए जाने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ-साथ गांवों में भी तरक्की की रफ्तार बढ़ सकती है।
खेल और संस्कृति को भी युवा विकास का अहम जरिया बताते हुए उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए विद्यार्थियों को पर्याप्त मंच मिलना चाहिए। खेल नौजवानों में अनुशासन, टीम भावना और आत्मविश्वास पैदा करता है, जबकि संस्कृति उन्हें अपनी जड़ों और विरासत से जोड़े रखती है।
उन्होंने अवसरों तक पहुंच और सही मेंटरशिप को भी बेहद जरूरी बताया। कई बार सरहदी और दूरदराज इलाकों में रहने वाले प्रतिभाशाली बच्चे सिर्फ इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि उन्हें सही समय पर सही जानकारी और रहनुमाई नहीं मिल पाती। ऐसे में अनुभवी शिक्षकों, विशेषज्ञों और कामयाब पेशेवरों से मार्गदर्शन दिलाना इन बच्चों के भविष्य को नई दिशा दे सकता है।
कार्यक्रम में आर्मी गुडविल स्कूलों और केंद्रीय विद्यालयों के विद्यार्थियों की मौजूदगी ने भी यह संदेश दिया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शिक्षा को मजबूत बनाने की कोशिशों का मकसद बच्चों को मुख्यधारा के अवसरों से जोड़ना है। अगर इन इलाकों के बच्चों को अच्छी तालीम, तकनीकी हुनर, खेल, रोजगार और सही रहनुमाई एक साथ मिले, तो वे अपने गांवों से ही बड़े सपनों की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के सरहदी इलाकों के बच्चों के लिए यह सोच इसलिए भी अहम है क्योंकि उनके सपने किसी बड़े शहर के बच्चों से कम नहीं हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें उन सपनों तक पहुंचने के लिए सुविधाओं और मौकों की ज्यादा जरूरत है। शिक्षा, तकनीक और रोजगार के रास्ते मजबूत होने से सीमावर्ती गांवों के बच्चे न सिर्फ अपनी जिंदगी बदल सकते हैं, बल्कि अपने गांव, समाज और पूरे जम्मू-कश्मीर की नई तस्वीर बनाने में भी अहम किरदार अदा कर सकते हैं।


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