मावरहनवारा की इस बेटी ने वर्ष 2019 में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट को कामयाबी के साथ पास किया था। इसके बाद मेडिकल शिक्षा के कठिन सफर की शुरुआत हुई। सीमित सुविधाओं वाले ग्रामीण परिवेश से निकलकर मेडिकल कॉलेज तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन उन्होंने हर मुश्किल को अपने हौसले के सामने छोटा साबित किया। लगातार मेहनत और पढ़ाई के प्रति लगन के साथ उन्होंने राजकीय मेडिकल कॉलेज बारामूला से एमबीबीएस की डिग्री पूरी की और वर्ष 2025 में डॉक्टर बनने का मुकाम हासिल किया। अब वह वर्ष 2026 की स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा में भी शामिल हो चुकी हैं और चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी तालीम को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। उनकी यह कामयाबी इस बात का पैगाम देती है कि अगर बच्चों को सही रहनुमाई, बेहतर तालीम और आगे बढ़ने का मौका मिले तो गांव और दूरदराज इलाकों की बेटियां भी बड़े से बड़े मुकाम हासिल कर सकती हैं।
इस कामयाबी के सफर में आर्मी गुडविल स्कूल नोगाम की भूमिका को वह बेहद अहम मानती हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय स्कूल, अपने शिक्षकों और परिवार के उन लोगों को दिया, जिन्होंने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया। आर्मी गुडविल स्कूलों का मकसद दूरदराज और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर अवसर उपलब्ध कराना रहा है। ऐसे स्कूलों से पढ़कर निकलने वाले विद्यार्थी आज शिक्षा, चिकित्सा, खेल, तकनीक और दूसरे क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं। मावरहनवारा की इस बेटी की उपलब्धि इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी है, जहां तालीम ने गांव और बड़े पेशेवर मुकाम के बीच मौजूद फासले को कम करने का काम किया है।
उनकी कामयाबी के पीछे परिवार की प्रेरणा भी एक अहम ताकत रही। उनके भाई ने आर्मी गुडविल स्कूल पहलगाम से शिक्षा हासिल की और आज भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। एक ही परिवार के भाई-बहन का शिक्षा और सेवा के अलग-अलग क्षेत्रों में आगे बढ़ना इस बात की खूबसूरत मिसाल है कि अच्छी तालीम का असर सिर्फ एक शख्स की जिंदगी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अगली नस्ल के सोचने और आगे बढ़ने के अंदाज़ को बदल देता है। एक तरफ भाई ने वतन की खिदमत का रास्ता चुना, तो दूसरी तरफ बहन ने चिकित्सा के क्षेत्र में कदम रखकर लोगों की सेवा को अपना पेशा बनाया।
डॉक्टर बनने के बाद उन्होंने कश्मीर के नौजवानों के लिए एक अहम पैगाम भी दिया है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे नशे और ऐसी गतिविधियों से दूर रहें जो उनके मुस्तकबिल को तबाह कर सकती हैं और इसके बजाय तालीम, हुनर और मेहनत को अपनी जिंदगी का मकसद बनाएं। आज जब कश्मीर का नौजवान शिक्षा, खेल, उद्यमिता और पेशेवर क्षेत्रों में नई पहचान बना रहा है, ऐसे में उनकी कहानी खास तौर पर ग्रामीण और दूरदराज इलाकों के विद्यार्थियों के लिए हौसला बढ़ाने वाली है।
मावरहनवारा की इस बेटी का सफर सिर्फ एक छात्रा के डॉक्टर बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बदलाव की तस्वीर भी है जिसमें कश्मीर के दूरदराज गांवों के बच्चे दूरी और सामाजिक सीमाओं को पीछे छोड़कर अपने लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं। आर्मी गुडविल स्कूल से शुरू हुआ सफर मेडिकल कॉलेज तक पहुंचा और अब स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा की ओर बढ़ रहा है। उनकी उपलब्धि यह बताती है कि वादी के किसी भी कोने में रहने वाला बच्चा अगर मेहनत और सही दिशा के साथ आगे बढ़े तो उसके ख्वाबों की कोई सरहद नहीं होती। ऐसी बेटियां न सिर्फ अपने परिवारों की शान बन रही हैं, बल्कि पूरे कश्मीर के नौजवानों के लिए यह भरोसा भी मजबूत कर रही हैं कि तालीम ही वह रास्ता है जो दूरी, मुश्किल और सामाजिक रुकावटों को पीछे छोड़कर मुस्तकबिल की नई राह खोल सकती है।


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