ए.आर. रहमान ने इस बात की तरफ भी इशारा किया कि सिनेमा के पास किसी इलाके की पहचान और उसकी छवि को दुनिया तक पहुंचाने की बड़ी ताकत है। उनका मानना है कि बॉलीवुड और देश का फिल्म उद्योग कश्मीर को सिर्फ अतीत के मुश्किल दौर और हिंसा के संदर्भ में पेश करने के बजाय इसकी प्राकृतिक खूबसूरती, सांस्कृतिक विरासत, कला, संगीत, इंसानी रिश्तों और अमन की तस्वीर को भी सामने लाए। कश्मीर की बर्फ से ढकी चोटियां, झीलें, दरियाएं, हरे-भरे मैदान, पुराने शहर की विरासत और गांवों की सादगी ऐसी दौलत हैं, जिन्हें कैमरे के जरिए दुनिया के सामने पेश किया जा सकता है। इससे न केवल सैर-ओ-सियाहत को बढ़ावा मिल सकता है, बल्कि वादी की नई पीढ़ी के लिए फिल्म, संगीत, फोटोग्राफी, लेखन और दूसरी रचनात्मक गतिविधियों में नए रास्ते भी खुल सकते हैं।
रहमान का कश्मीर को लेकर सकारात्मक नजरिया ऐसे वक्त में सामने आया है, जब जम्मू-कश्मीर में फिल्म और रचनात्मक क्षेत्र को नई दिशा देने की कोशिशें जारी हैं। अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव जम्मू-कश्मीर जैसे आयोजनों ने स्थानीय कलाकारों, फिल्मकारों और युवाओं को बड़े मंच से जुड़ने का अवसर दिया है। ऐसे आयोजनों से वादी में मौजूद रचनात्मक हुनर को देश के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ती है। कश्मीर के नौजवानों में कहानी कहने, कैमरा, संगीत, अभिनय और डिजिटल माध्यमों के प्रति बढ़ती दिलचस्पी को देखते हुए फिल्म महोत्सव आने वाले समय में एक ऐसा मंच बन सकता है, जहां स्थानीय प्रतिभाएं अपने ख्वाबों को हकीकत में बदलने की राह तलाश सकें।
ए.आर. रहमान जैसे अंतरराष्ट्रीय पहचान रखने वाले कलाकार का कश्मीर के बारे में खुलकर सकारात्मक बात करना इस बदलाव के लिए खास मायने रखता है। उनकी आवाज करोड़ों लोगों तक पहुंचती है और उनका अनुभव दुनिया के कई हिस्सों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में जब वह कश्मीर को खूबसूरत, स्वागत करने वाला और रचनात्मक माहौल रखने वाली जगह के तौर पर देखते हैं, तो यह संदेश वादी से बाहर भी जाता है कि जम्मू-कश्मीर सिर्फ खबरों की सुर्खियों तक सीमित क्षेत्र नहीं, बल्कि कला और संस्कृति की गहरी विरासत रखने वाली धरती है। यहां के लोगों की मेहमाननवाजी, सूफियाना परंपरा, संगीत, दस्तकारी, साहित्य और सदियों पुरानी सांस्कृतिक रवायतें कश्मीर की पहचान को अलग मुकाम देती हैं।
इस सकारात्मक सोच का सबसे बड़ा असर वादी के नौजवानों के मुस्तकबिल पर पड़ सकता है। आज की पीढ़ी सिनेमा और डिजिटल माध्यमों से दुनिया के साथ सीधे जुड़ी हुई है। अगर कश्मीर की कहानियां कश्मीर के ही नौजवान अपने नजरिये से दुनिया तक पहुंचाएं, तो इससे स्थानीय प्रतिभा को पहचान के साथ-साथ रोजगार और उद्यमिता के नए मौके भी मिल सकते हैं। फिल्म निर्माण, अभिनय, संपादन, संगीत, एनीमेशन, पर्यटन आधारित सामग्री और डिजिटल मीडिया जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। इस लिहाज से अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव केवल फिल्मों की स्क्रीनिंग तक सीमित आयोजन न रहकर हुनर, तालीम, सहयोग और नए कारोबारी अवसरों का जरिया भी बन सकता है।
कश्मीर के लिए सिनेमा का यह नया नजरिया उसकी बदलती तस्वीर को दुनिया के सामने रखने का एक अहम जरिया बन सकता है। वादी की खूबसूरती को कैमरे में कैद करने के साथ-साथ यहां की असल जिंदगी, स्थानीय संस्कृति और लोगों की उम्मीदों को कहानी का हिस्सा बनाया जाए तो कश्मीर की पहचान और भी मजबूत होगी। ए.आर. रहमान का संदेश इसी दिशा में एक अहम आवाज के तौर पर देखा जा सकता है कि कश्मीर को उसकी पूरी खूबसूरती और विविधता के साथ दुनिया के सामने पेश किया जाए। आने वाले दिनों में अगर फिल्मकार, कलाकार और स्थानीय नौजवान मिलकर वादी की नई कहानियां दुनिया तक पहुंचाते हैं, तो इससे जम्मू-कश्मीर के सैर-ओ-सियाहत, संस्कृति और रचनात्मक अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिल सकती है और नौजवानों के मुस्तकबिल के लिए भी नए दरवाजे खुल सकते हैं।


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