माछिल में कई परिवारों ने अपने घरों के हिस्सों को होमस्टे में तब्दील करना शुरू कर दिया है। यहां आने वाले मेहमानों को रहने की बुनियादी सहूलियत के साथ स्थानीय तौर पर तैयार किया गया खाना भी मुहैया कराया जा रहा है। इससे स्थानीय परिवारों को आमदनी का सीधा जरिया मिल रहा है। माछिल के पूर्व सरपंच हबीबुल्लाह ने कहा कि पर्यटन ने लोगों को एक नई उम्मीद दी है। उनके मुताबिक जिला प्रशासन और खास तौर पर भारतीय सेना ने क्षेत्र को पर्यटन के नक्शे पर लाने और स्थानीय लोगों को पर्यटन गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि होमस्टे से लेकर युवाओं के गाइड और परिवहन सेवाओं में शामिल होने तक, पर्यटन धीरे-धीरे माछिल में एक मुकम्मल आर्थिक सिलसिला कायम कर सकता है।
माछिल की खूबसूरती अब स्थानीय स्तर पर विकसित हो रही सुविधाओं के जरिए भी सैलानियों तक पहुंच रही है। ज़ेड-गली में स्थित नाज़-ए-हिंद और ज़ुलू कैफ़े पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। भारतीय सेना की ओर से स्थापित यह सड़क किनारे का कैफ़े विभिन्न प्रकार के फास्ट फूड उपलब्ध कराता है और सीमित पर्यटन ढांचे वाले इस इलाके में आने वाले लोगों के सफर को अधिक सुविधाजनक बना रहा है। पुष्वारी के निवासी अब्दुल जब्बार के मुताबिक माछिल की पर्यटन क्षमता मौजूदा चर्चित स्थलों से कहीं अधिक है। रिंग बाला, रिंग पायिन, कटवारा, पुष्वारी, डप्पल और मिसरी बेहक जैसे इलाकों में भी कुदरती खूबसूरती की कोई कमी नहीं है। उनका कहना है कि बेहतर सड़क संपर्क और बुनियादी ढांचा विकसित होने से सैलानी यहां सिर्फ गुजरने के बजाय ज्यादा वक्त ठहरकर इन इलाकों को करीब से देख सकेंगे।
होमस्टे स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम कड़ी बनते दिखाई दे रहे हैं। निवासी शब्बीर अहमद ने बताया कि एक कमरे का किराया आम तौर पर करीब 2,000 रुपये लिया जाता है, जिसमें स्थानीय रूप से तैयार भोजन भी शामिल होता है। इससे न केवल परिवारों को आमदनी मिल रही है बल्कि सैलानियों को भी माछिल की स्थानीय जिंदगी, खान-पान और मेहमाननवाजी को करीब से महसूस करने का मौका मिल रहा है। पहली बार घाटी पहुंचे लालपोरा के नासिर अहमद ने माछिल के माहौल को बेहद सुकूनभरा बताते हुए कहा कि दिनभर की साफ हवा और ठंडी हवाओं ने उन्हें काफी प्रभावित किया। उनके मुताबिक माछिल में एक सीमावर्ती पर्यटन स्थल के तौर पर उभरने की भरपूर संभावनाएं मौजूद हैं।
माछिल की पहचान सिर्फ सैर-ओ-सियाहत तक सीमित नहीं है। घाटी की अपनी कृषि विरासत भी है, जहां स्थानीय लोग मुख्य रूप से आलू, राजमा और मक्का उगाते हैं। इलाके के कई हिस्सों में धान की खेती संभव नहीं होने के कारण इन फसलों का स्थानीय अर्थव्यवस्था में खास महत्व है। यहां का राजमा अपने स्वाद और स्थानीय स्तर पर होने वाली खेती के लिए जाना जाता है। इसका बड़ा हिस्सा सर्दियों के लिए सुरक्षित रखा जाता है, क्योंकि भारी बर्फबारी के दौरान बाजार और दुकानों तक जरूरी सामान की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। शब्बीर अहमद के मुताबिक माछिल का राजमा अपने स्वाद और प्रोटीन की वजह से पसंद किया जाता है और किसानों को इससे अच्छी आमदनी भी हासिल होती है।
माछिल में पर्यटन अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसकी दस्तक ने स्थानीय लोगों के मुस्तकबिल को लेकर एक नई उम्मीद पैदा की है। बेहतर कनेक्टिविटी, योजनाबद्ध बुनियादी ढांचे, होमस्टे और स्थानीय कृषि उत्पादों को बढ़ावा देकर यह सीमावर्ती घाटी आने वाले समय में एक टिकाऊ स्थानीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद बन सकती है। प्राकृतिक खूबसूरती, स्थानीय मेहमाननवाजी और कृषि उत्पादों का मेल माछिल को कश्मीर के उभरते हुए सैर-ओ-सियाहत स्थलों में एक अलग पहचान दिला सकता है।

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