एलओसी पर अमन का असर, गांवों में लौटी रौनक और पर्यटन ने पकड़ी रफ्तार


कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) से सटे इलाकों में बीते कुछ अरसे के दौरान जिंदगी का रंग काफी हद तक बदलता नजर आ रहा है। कभी सरहद पार से होने वाली गोलाबारी और उसके खौफ के बीच गुजर-बसर करने वाले केरन, माछिल, तंगधार, गुरेज, उरी और लोलाब जैसे इलाकों में अब आम जिंदगी फिर से पटरी पर लौट रही है। इन सरहदी गांवों में जहां एक ओर स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियां बढ़ी हैं, वहीं दूसरी तरफ सैलानियों की बढ़ती आमद ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई रफ्तार दी है।

उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस साल उत्तरी कश्मीर के इन सरहदी इलाकों में 4.30 लाख से ज्यादा सैलानी पहुंच चुके हैं। अकेले कुपवाड़ा में करीब तीन लाख पर्यटकों की आमद दर्ज की गई है। सैलानियों की यह बढ़ती तादाद इस बात का इशारा है कि कभी सुरक्षा चुनौतियों और लगातार तनाव के लिए पहचाने जाने वाले सरहदी इलाके अब पर्यटन और सामान्य सामाजिक जिंदगी के नए मरकज के तौर पर उभर रहे हैं।

खौफ के माहौल से सामान्य जिंदगी तक

एलओसी के नजदीक बसे गांवों के लोगों के लिए यह बदलाव महज पर्यटन के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इन इलाकों में सामान्य जिंदगी की वापसी का असर घर-परिवार से लेकर खेतों, स्कूलों और स्थानीय सामाजिक गतिविधियों तक दिखाई दे रहा है।

जिन गांवों में पहले गोलाबारी के दौरान लोगों को सुरक्षित स्थानों की तरफ जाना पड़ता था, वहां अब शादियां और दूसरे सामाजिक कार्यक्रम पहले की तरह आयोजित हो रहे हैं। किसान खेतों में काम कर रहे हैं, बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं और स्थानीय नौजवान खेल गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं। यानी सरहदी गांवों में जिंदगी अब सिर्फ सुरक्षा के सवाल के इर्द-गिर्द नहीं घूम रही, बल्कि लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और तरक्की पर भी ध्यान दे पा रहे हैं।

स्थानीय लोगों के मुताबिक संघर्षविराम के बाद पैदा हुए अपेक्षाकृत शांत माहौल ने लोगों के अंदर से डर को काफी कम किया है। इसका सीधा असर सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ा है। बाजारों में आवाजाही बढ़ी है और गांवों में छोटे स्तर पर रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं।

होमस्टे और स्थानीय कारोबार को मिला सहारा

सरहदी कश्मीर में बढ़ते पर्यटन ने स्थानीय लोगों के लिए आमदनी के नए दरवाजे भी खोले हैं। कई जगहों पर स्थानीय परिवार पर्यटकों को ठहराने के लिए होमस्टे की ओर बढ़ रहे हैं। इससे सिर्फ मकान मालिकों को फायदा नहीं हो रहा, बल्कि स्थानीय दुकानदारों, टैक्सी चालकों, गाइडों, दस्तकारों और दूसरे छोटे कारोबारियों की आमदनी भी बढ़ रही है।

इन इलाकों की खूबसूरत वादियां, पहाड़ी रास्ते, स्थानीय संस्कृति और गांवों की सादगी सैलानियों के लिए खास आकर्षण बन रही है। इससे सरहदी क्षेत्रों में पर्यटन को महज घूमने-फिरने की गतिविधि के बजाय स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाले एक अहम जरिये के तौर पर देखा जाने लगा है।

स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक केंद्रों और सामुदायिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल रहा है। इससे नई पीढ़ी को अपनी स्थानीय विरासत और संस्कृति से जुड़े रहने का मौका मिल रहा है और बाहर से आने वाले सैलानी भी इन इलाकों की पारंपरिक जिंदगी को करीब से देखने का मौका पा रहे हैं।

नौजवानों के लिए बढ़ते मौके

सरहदी इलाकों में सामान्य हालात की बहाली का एक अहम पहलू नौजवानों की बढ़ती भागीदारी भी है। स्थानीय खेल गतिविधियों में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है। क्रिकेट और दूसरे खेलों के आयोजन गांवों में सामाजिक मेलजोल और सकारात्मक माहौल को मजबूत कर रहे हैं।

कभी गोलाबारी और तनाव के साए में रहने वाले इन इलाकों के नौजवान अब अपनी तालीम, खेल और रोजगार पर ज्यादा ध्यान देने की कोशिश कर रहे हैं। यह बदलाव इस लिहाज से भी अहम है कि किसी भी सरहदी इलाके में स्थायी अमन और तरक्की के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी मानी जाती है।

सरहद से सटे गांवों की बदलती तस्वीर

केरन, माछिल, तंगधार, गुरेज, उरी और लोलाब जैसे इलाकों में नजर आने वाला बदलाव यह बताता है कि अमन का असर सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। जब लोगों को लगातार तनाव और गोलाबारी का सामना नहीं करना पड़ता, तो गांवों में सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक गतिविधियों के लिए भी बेहतर माहौल पैदा होता है।

आज इन सरहदी गांवों में शादियों की रौनक, खेतों में काम करते किसान, स्कूल जाते बच्चे, खेल के मैदानों में जुटते नौजवान और सैलानियों की आवाजाही एक नई तस्वीर पेश कर रही है। यह तस्वीर उस दौर से अलग है जब सरहद के करीब रहने वाले लोगों की जिंदगी अक्सर गोलाबारी और अनिश्चितता से प्रभावित रहती थी।

उत्तरी कश्मीर के सरहदी इलाकों में पर्यटन की बढ़ती आमद और सामान्य जिंदगी की वापसी इस बात की तरफ इशारा करती है कि यहां के गांव अब महज सरहद की निगरानी वाले इलाके नहीं रहे। ये इलाके अपनी खूबसूरती, संस्कृति, मेहनतकश आबादी और सामुदायिक जिंदगी के जरिए एक नई पहचान बना रहे हैं।

गोलाबारी के खौफ से निकलकर जश्न, खेती, तालीम, खेल और पर्यटन की तरफ बढ़ता यह सफर सरहदी कश्मीर में अमन, बहाली और तरक्की की बदलती तस्वीर को सामने लाता है।

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