माहरंग बलोच और सिबगतुल्लाह शाहजी को 22 जून 2026 को क्वेटा की आतंकवाद निरोधी अदालत ने एक फ्रंटियर कॉर्प्स कर्मी की मौत से जुड़े मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। पाकिस्तानी अभियोजन पक्ष ने दोनों पर 2024 में ग्वादर में हुए बलोच नेशनल गैदरिंग के दौरान हिंसा भड़काने और सुरक्षा कर्मी की मौत से जुड़े आरोप लगाए थे। पाकिस्तान के आधिकारिक पक्ष में अदालत के फैसले को न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम बताया गया है, जबकि माहरंग के समर्थकों और अधिकार संगठनों ने मामले और सुनवाई की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ा है क्योंकि मानवाधिकार संगठनों ने निष्पक्ष सुनवाई और उचित कानूनी प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई है। Amnesty International ने 23 जून को कहा था कि दोनों कार्यकर्ताओं को जेल में हुई सुनवाई के बाद उम्रकैद दी गई और कार्यवाही की पारदर्शिता तथा निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं। संगठन ने पाकिस्तान से दोनों को तत्काल रिहा करने की मांग की थी।
माहरंग बलोच लंबे समय से बलोचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगियों और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ आवाज उठाती रही हैं। उनकी गिरफ्तारी और अब उम्रकैद ने पाकिस्तान में आतंकवाद निरोधी कानूनों के इस्तेमाल तथा असहमति की आवाजों के साथ राज्य के व्यवहार पर बहस को और तेज कर दिया है।
मई 2026 में UN Committee Against Torture ने भी पाकिस्तान में मानवाधिकार रक्षकों, नागरिक समाज कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, वकीलों और सरकार के आलोचकों के खिलाफ कथित मनमानी गिरफ्तारी, हिरासत, धमकी और राजनीतिक रूप से प्रेरित मुकदमों की रिपोर्टों पर चिंता जताई थी। समिति ने माहरंग बलोच की स्थिति का भी उल्लेख किया था।
अब अधिकार समूहों की ओर से UN WGAD तक मामला ले जाने की कोशिश पाकिस्तान के लिए एक और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार चुनौती बन सकती है। माहरंग बलोच का मामला केवल एक कार्यकर्ता की सजा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आतंकवाद निरोधी कानूनों के इस्तेमाल, न्यायिक प्रक्रिया, असहमति के अधिकार और बलोचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति पर पाकिस्तान से जवाब मांगने वाला बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

0 टिप्पणियाँ