पाकिस्तान में प्रतिबंधित आतंकी तंजीमों के नेटवर्क को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) ने इस्लामाबाद स्थित मरकज़ क़ुबा में अपनी महिला विंग के लिए आईटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी ट्रेनिंग का इंतज़ाम किया। बताया जाता है कि इन सेशनों में लश्कर के सीनियर कमांडरों ने खुद ट्रेनिंग दी। अगर यह जानकारी सही है, तो यह सिर्फ एक आतंकी संगठन की गतिविधि नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अंदर मौजूद आतंकी ढाँचे के बदलते हुए मिज़ाज की तरफ एक अहम इशारा है।
कभी आतंकी तंजीमें अपनी कैडर ट्रेनिंग को हथियार, फिदायीन कार्रवाई और बुनियादी सैन्य कौशल तक महदूद रखती थीं। लेकिन आज का दौर टेक्नोलॉजी का है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल कम्युनिकेशन, डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने आतंकवादी संगठनों के सामने भी नए मौके पैदा किए हैं। ऐसे में किसी प्रतिबंधित आतंकी संगठन की तरफ से अपने कैडरों को IT और AI की ट्रेनिंग देना इस बात को दिखाता है कि आतंकी नेटवर्क भी बदलते टेक्नोलॉजी माहौल के मुताबिक अपने तौर-तरीके modernise करने की कोशिश कर रहे हैं।
इस मामले का एक और अहम पहलू महिला विंग की सक्रियता है। महिलाओं को तकनीकी हुनर से लैस करने की कोशिश यह संकेत देती है कि संगठन अपने कैडर बेस को सिर्फ पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं रखना चाहता। आईटी और डिजिटल कौशल भविष्य में प्रचार, ऑनलाइन नेटवर्किंग, सूचना के प्रसार और संगठनात्मक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसलिए ऐसी ट्रेनिंग को महज़ एक educational session समझना मुनासिब नहीं होगा।
सबसे बड़ा सवाल पाकिस्तान की हुकूमत की भूमिका पर उठता है। लश्कर-ए-तैयबा पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाबंदियाँ मौजूद हैं। इसके बावजूद अगर उसके वरिष्ठ कमांडर राजधानी इस्लामाबाद में किसी केंद्र पर कैडरों को ट्रेनिंग देने में सक्षम हैं, तो यह पाकिस्तान की उस दलील पर सवाल खड़ा करता है कि उसने अपनी सरज़मीं से आतंकी ढाँचों का पूरी तरह खात्मा कर दिया है।
यह मामला एक व्यापक तस्वीर सामने लाता है। आतंकी इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ हथियारों और कैंपों का नाम नहीं है। कैडर भर्ती, वैचारिक लामबंदी, तकनीकी प्रशिक्षण और डिजिटल क्षमता भी उसी नेटवर्क का हिस्सा बन सकते हैं। इसलिए पाकिस्तान के लिए असली इम्तिहान केवल किसी संगठन को कागज़ पर प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि उसके पूरे नेटवर्क, फंडिंग, भर्ती और ट्रेनिंग ढाँचे को जमीन पर खत्म करना है।
अगर प्रतिबंधित तंजीमें खुले तौर पर अपने कैडरों की नई पीढ़ी को आधुनिक तकनीक सिखाने में लगी हुई हैं, तो यह सिर्फ आतंकवाद के पुराने चेहरे की कहानी नहीं है। यह उस खतरे की निशानदेही है जो अब टेक्नोलॉजी के साथ एक नया रूप ले रहा है।

0 टिप्पणियाँ