हुडभॉय के मुताबिक, बैठक के दौरान जब एक कुलपति ने अपनी बात रखने की कोशिश की तो उन्हें कथित तौर पर इतना जोर से थप्पड़ मारा गया कि वह इसके बाद चुप हो गए। हालांकि, यह दावा हुडभॉय का है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
हुडभॉय ने इस घटनाक्रम को पाकिस्तान में शिक्षा जगत पर बढ़ते सैन्य प्रभाव और विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता के लिए चिंताजनक संकेत के तौर पर पेश किया है। उनका दावा ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान में सेना और उससे जुड़े संस्थानों की भूमिका को लेकर अकादमिक और नागरिक हलकों में बहस जारी है।
विश्वविद्यालयों को आम तौर पर स्वतंत्र विचार, बहस और आलोचनात्मक चिंतन का केंद्र माना जाता है। ऐसे में यदि किसी सैन्य या सरकारी संस्था की ओर से विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्रों के राजनीतिक या राष्ट्रवादी विचारों को प्रभावित करने के निर्देश दिए जाते हैं, तो इससे अकादमिक स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
हुडभॉय लंबे समय से पाकिस्तान में शिक्षा व्यवस्था, वैज्ञानिक सोच और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहे हैं। उनके ताजा दावे ने एक बार फिर इस बहस को सामने ला दिया है कि पाकिस्तान के विश्वविद्यालयों में छात्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने और विभिन्न विचारों पर चर्चा करने की कितनी गुंजाइश उपलब्ध है।
कुलपतियों की कथित बैठक और उसमें डराने-धमकाने के आरोप अगर सही साबित होते हैं, तो यह केवल विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव का मामला नहीं होगा, बल्कि पाकिस्तान में अकादमिक संस्थानों पर सैन्य प्रभाव और स्वतंत्र आवाजों के लिए सिकुड़ती जगह का भी संकेत माना जाएगा।

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