पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर में 2026 के विधानसभा चुनाव कई वजहों से चर्चा में रहे हैं। चुनाव के विभिन्न चरणों के बीच राजनीतिक तनाव, विरोध प्रदर्शनों और बहिष्कार के आह्वान ने पूरी प्रक्रिया को सामान्य चुनावी माहौल से अलग बना दिया। खास तौर पर बाग और हफेली जिलों के कुछ इलाकों से सामने आई मतदान की तस्वीर ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है, जहां कई मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की मौजूदगी बेहद कम दिखाई दी।
बाग-2 के कुछ मतदान केंद्रों से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड में शून्य मतदान दर्ज होने की बात सामने आई है। अगर किसी मतदान केंद्र पर पूरे दिन एक भी वोट दर्ज नहीं होता है तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं रहता बल्कि उस इलाके के राजनीतिक माहौल और लोगों के चुनाव के प्रति रुख को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेत बन जाता है। हालांकि, ऐसे आंकड़ों को पूरे क्षेत्र की राय मानने से पहले निर्वाचन रिकॉर्ड और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
इस चुनावी माहौल के पीछे Joint Awami Action Committee (JAAC) का बहिष्कार आह्वान भी एक महत्वपूर्ण कारक रहा। JAAC ने चुनावों का विरोध मुख्य रूप से विधानसभा में उन 12 सीटों के मुद्दे को लेकर किया जो पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर से विस्थापित लोगों के लिए आरक्षित हैं। संगठन का तर्क है कि इन सीटों की व्यवस्था क्षेत्र की राजनीतिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था को प्रभावित करती है।
इसी दौरान क्षेत्र में पहले से चले आ रहे विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा संबंधी तनाव ने भी चुनावी माहौल को प्रभावित किया। रिपोर्टों के अनुसार कुछ स्थानों पर हिंसक झड़पें हुईं और अंतिम चरण में सुरक्षा कारणों से कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान को स्थगित भी करना पड़ा।
लेकिन तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं रही। चुनाव के पहले दो चरणों में कई क्षेत्रों में मतदान 50 प्रतिशत से ऊपर रहा और पाकिस्तान की सत्तारूढ़ PML-N ने 34 में से 24 सीटों पर जीत हासिल की। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनावी भागीदारी और बहिष्कार की स्थिति पूरे पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर में समान नहीं थी।
फिर भी बाग और हफेली के कुछ मतदान केंद्रों की खाली तस्वीर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करती है—जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति लोगों का एक हिस्सा भरोसा खोने लगे या उससे दूरी बनाने लगे तो उस असंतोष के कारणों को समझना कितना जरूरी हो जाता है?
कश्मीर की सियासत में जनता की आवाज हमेशा महत्वपूर्ण रही है। चाहे वह मतदान के जरिए सामने आए या शांतिपूर्ण असहमति और बहिष्कार के रूप में, लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए जरूरी है कि लोगों की शिकायतों, प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों और राजनीतिक चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए।
बाग और हफेली के इन मतदान केंद्रों का सन्नाटा इसलिए केवल चुनावी आंकड़ा नहीं है। यह उस व्यापक राजनीतिक असंतोष की ओर ध्यान दिलाता है जिसे समझे बिना क्षेत्र की राजनीति को पूरी तरह समझना मुश्किल होगा।

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