पाकिस्तान की सियासत में फौज का दखल कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब खुद पूर्व सैन्य कर्मियों की तरफ से उठ रही आवाजें पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के अंदर की एक अलग तस्वीर सामने ला रही हैं। रिटायर्ड पाकिस्तानी सैन्य कर्मियों से जुड़े एक संगठन ने मौजूदा पाकिस्तान आर्मी से दूरी बनाते हुए उसे यहां तक कहा है कि “यह हमारी फौज नहीं है।” संगठन का आरोप है कि मौजूदा फौज अपने ही लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है और अपने ही अवाम को निशाना बना रही है।
यह बयान ऐसे वक्त में सामने आया है जब पाकिस्तान में सेना और आम लोगों के बीच रिश्तों को लेकर लगातार बहस चल रही है। पूर्व सैनिकों की तरफ से इस तरह खुलकर असहमति जताना इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान आर्मी लंबे समय से देश की सबसे प्रभावशाली संस्थाओं में से एक रही है।
मामले का एक और गंभीर पहलू Major Shehbaz से जुड़ा है। संगठन के Information Secretary Major Shehbaz की पेंशन कथित तौर पर रोक दी गई है। इसके बाद संगठन ने ऐलान किया कि वह खुद उनकी पेंशन का खर्च उठाएगा। यह कदम सिर्फ एक पूर्व सैन्य अधिकारी की आर्थिक मदद तक महदूद नहीं है, बल्कि इसे संगठन और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच बढ़ते मतभेद की निशानी के तौर पर भी देखा जा रहा है।
पूर्व सैनिकों का यह रुख पाकिस्तान आर्मी के लिए असहज सवाल खड़े करता है। जिस संस्था से कभी जुड़े रहे लोग अगर सार्वजनिक तौर पर उसकी कार्यशैली और नीतियों पर सवाल उठाने लगें, तो इससे उसके अंदर मौजूद असंतोष का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह घटनाक्रम पाकिस्तान के उस पुराने ढांचे पर भी सवाल उठाता है जिसमें सेना को सिर्फ एक सुरक्षा संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति और शासन व्यवस्था में एक निर्णायक शक्ति के रूप में देखा जाता रहा है। अगर रिटायर्ड सैनिक संगठन अब मौजूदा सैन्य नेतृत्व से खुद को अलग बताने लगें, तो यह veteran community के भीतर बढ़ती disaffection की तरफ इशारा कर सकता है।
हालांकि, इन आरोपों को संबंधित संगठन के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। उपलब्ध जानकारी से पाकिस्तान आर्मी के पूरे संस्थागत ढांचे में व्यापक विभाजन का स्वतंत्र रूप से निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। लेकिन इतना जरूर है कि पूर्व सैनिकों की खुली नाराजगी सैन्य प्रतिष्ठान के लिए एक गंभीर perception challenge बन सकती है।
पाकिस्तान में फौज और उसके पूर्व कर्मियों के बीच यह बढ़ता फासला आने वाले वक्त में वहां की सियासत और समाज पर कितना असर डालता है, यह देखना अहम होगा। अगर अपने ही पूर्व सैनिक अपनी पुरानी संस्था को “अपनी फौज” मानने से इनकार करने लगें, तो यह किसी भी सैन्य प्रतिष्ठान के लिए मामूली बात नहीं होती

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