श्रीनगर:
कश्मीर की बदलती तस्वीर
में अब महिलाएं सिर्फ
रोजगार की तलाश करने
वाली नहीं, बल्कि खुद रोजगार पैदा
करने वाली भी बन
रही हैं। ऐसी ही
एक मिसाल हैं मुमताज़ा,
जिन्होंने सरकारी नौकरी का इंतजार खत्म
होने के बाद अपने
दम पर पशुपालन का
कारोबार शुरू किया और
आज एक छोटे से
प्रयास को कामयाब livestock enterprise में बदल दिया
है।
मुमताज़ा ने वर्ष 2020 में महज 20 भेड़ों के साथ अपना
सफर शुरू किया था।
सरकारी नौकरी हासिल करने की उनकी
कोशिश कामयाब नहीं हो सकी,
लेकिन उन्होंने इसे अपनी मंजिल
का अंत नहीं बनने
दिया। परिवार के सहयोग और
अपनी मेहनत के दम पर
उन्होंने भेड़ पालन को
ही अपना रोजगार बनाने
का फैसला किया।
शुरुआत भले ही छोटी
थी, लेकिन इरादा मजबूत था। मुमताज़ा को
Animal Husbandry Department से भी जरूरी
मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग
मिला। विभाग की सलाह और
पशुपालन से जुड़ी बेहतर
जानकारी को अपने काम
में इस्तेमाल करते हुए उन्होंने
धीरे-धीरे अपने फार्म
का विस्तार करना शुरू किया।
कुछ ही वर्षों
में 20 भेड़ों से शुरू हुआ
यह कारोबार अब करीब 500
भेड़ों
तक पहुंच चुका है। यह
बढ़ोतरी सिर्फ संख्या का बढ़ना नहीं
है, बल्कि मुमताज़ा की मेहनत, कारोबारी
समझ और self-reliance की कहानी भी
है।
उनका यह venture अब
उनके परिवार की आमदनी का
जरिया बनने के साथ-साथ दूसरे लोगों
के लिए भी रोजगार
के मौके पैदा कर
रहा है। यानी एक
महिला ने अपने लिए
रोजगार तलाशने के बजाय ऐसा
काम खड़ा किया, जिससे
दूसरों को भी रोजी-रोटी का साधन
मिल रहा है।
मुमताज़ा की कामयाबी का
असर उनके निजी जीवन
में भी साफ दिखाई
देता है। अपने कारोबार
से होने वाली आमदनी
के जरिए उन्होंने अपने
बच्चों
की पढ़ाई को बेहतर तरीके
से जारी रखने में
मदद की। इतना ही
नहीं, उन्होंने अपनी मेहनत की
कमाई से दो बार उमराह भी अदा किया।
कश्मीर के ग्रामीण इलाकों
में इस तरह की
कहानियां यह दिखाती हैं
कि अगर स्थानीय प्रतिभा
को सही guidance, सरकारी योजनाओं की जानकारी और
परिवार का सहयोग मिले,
तो छोटे स्तर से
शुरू किया गया कारोबार
भी बड़ा enterprise बन सकता है।
मुमताज़ा की कहानी खास
तौर पर कश्मीर की
महिलाओं के लिए एक
positive message लेकर आती है। सरकारी
नौकरी हर किसी को
नहीं मिल सकती, लेकिन
हुनर, मेहनत और सही planning के
जरिए self-employment और entrepreneurship
के रास्ते जरूर खोले जा
सकते हैं।
आज करीब 500 भेड़ों
का उनका फार्म इस
बात की मिसाल है
कि मौका
न मिले तो अपना रास्ता खुद बनाया जा सकता है। सरकारी guidance, परिवार के सहयोग और
लगातार मेहनत के साथ मुमताज़ा
ने न सिर्फ अपने
परिवार को मजबूत किया,
बल्कि दूसरों के लिए भी
रोजगार का जरिया तैयार
किया है।
उनकी
यह कहानी एक ऐसे कश्मीर
की तस्वीर पेश करती है
जहां महिलाएं आगे बढ़ रही
हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान दे
रही हैं और अपने
दम पर टिकाऊ आजीविका खड़ी कर रही
हैं।

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