पाकिस्तान के बलूचिस्तान में सुराब इलाके में हुई हिंसक घटना के बाद नागरिकों की मौत को लेकर गुस्सा बढ़ता जा रहा है। स्थानीय कार्यकर्ताओं और बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई में नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया और महिलाओं तथा बच्चों समेत बड़ी संख्या में लोग मारे गए। हालांकि पाकिस्तान की आधिकारिक रिपोर्ट इस घटना की अलग तस्वीर पेश करती है और उसके मुताबिक सुराब में तीन नागरिकों की मौत एक समय से पहले हुए कार-बम विस्फोट में हुई जबकि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 10 आतंकवादी मारे गए।
घटना के बाद बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संगठनों ने सरकारी दावे को खारिज करते हुए इसे गलत और मनगढ़ंत बताया है। उनका कहना है कि सुराब में हवाई हमले के दौरान आम नागरिक प्रभावित हुए। स्थानीय रिपोर्टों में भी 20 से अधिक लोगों के मारे जाने और महिलाओं तथा बच्चों के हताहत होने के दावे सामने आए हैं।
घटना ने बलूचिस्तान में पहले से मौजूद असंतोष को और तेज कर दिया है। बलूच यकजहती कमेटी (BYC) ने नागरिकों की मौत के विरोध में 13 अगस्त को पूरे बलूचिस्तान में शटर-डाउन और व्हील-जाम हड़ताल का आह्वान किया है। संगठन की मांगों में नागरिकों के खिलाफ कथित सैन्य कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघनों पर जवाबदेही प्रमुख मुद्दा है।
इसी बीच बलूचिस्तान की राजनीतिक आवाज भी तेज होती नजर आ रही है। बलूचिस्तान नेशनल पार्टी की ओर से 16 अगस्त को पूरे प्रांत में विरोध प्रदर्शन की घोषणा की गई है। अगर दोनों विरोध कार्यक्रमों में व्यापक भागीदारी होती है तो यह बलूचिस्तान में बढ़ते राजनीतिक और जन असंतोष का बड़ा संकेत बन सकता है।
बलूचिस्तान लंबे समय से सरकार, सेना और अलगाववादी संगठनों के बीच संघर्ष का केंद्र रहा है। यहां सुरक्षा बलों पर जबरन गुमशुदगी, हिरासत और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप लगते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर BLA और दूसरे सशस्त्र समूहों पर सुरक्षा बलों, सरकारी प्रतिष्ठानों और नागरिकों को निशाना बनाने के आरोप भी हैं। इस लगातार हिंसा ने आम बलूच नागरिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा और न्याय का खड़ा कर दिया है।
सुराब की घटना ने इसी पुराने संकट को एक बार फिर सामने ला दिया है। एक तरफ पाकिस्तान इसे आतंकवाद विरोधी कार्रवाई बता रहा है तो दूसरी तरफ बलूच संगठनों का आरोप है कि इसकी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ रही है।
अब 16 अगस्त के प्रस्तावित विरोध प्रदर्शनों पर नजर रहेगी। यदि बलूचिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरते हैं तो यह केवल एक सैन्य कार्रवाई के खिलाफ प्रतिक्रिया नहीं होगी बल्कि क्षेत्र में लंबे समय से जमा हो रहे गुस्से, अविश्वास और न्याय की मांग का बड़ा राजनीतिक संकेत भी बन सकती है।

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