जहां रास्ते खत्म होते हैं, वहां से शुरू होती है इन शिक्षकों की पाठशाला, पहाड़ों में लिखी जा रही 42 हजार बच्चों के भविष्य की नई कहानी

 


श्रीनगर: कश्मीर की ऊंची पहाड़ियों में गर्मियों के दिनों में एक अलग तरह की कक्षा सजती है। न यहां स्कूल की पक्की दीवारें हैं, न बड़ी-बड़ी खिड़कियां और न ही घंटी की आवाज। कभी किसी हरे-भरे चरागाह में खुले आसमान के नीचे बच्चे किताबें खोलकर बैठते हैं, तो कभी तंबू के भीतर ब्लैकबोर्ड के सामने अक्षर और संख्याएं सीखते हैं। इस कक्षा की सबसे खास बात यह है कि यह बच्चों के पास जाती है।

हर साल जब गुज्जर और बकरवाल परिवार अपने पारंपरिक मौसमी प्रवास पर मैदानी इलाकों से कश्मीर के ऊंचे चरागाहों की ओर बढ़ते हैं, तो करीब 2,200 Seasonal Educational Volunteers (SEVs) भी उनके साथ शिक्षा का सफर शुरू करते हैं। समग्र शिक्षा कार्यक्रम के तहत ये शिक्षक करीब 42,000 घुमंतू बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखते हैं। इन शिक्षकों के लिए स्कूल कोई एक इमारत नहीं, बल्कि वह जगह है जहां बच्चे सीखने के लिए एकत्र होते हैं।

एक ऐसा शिक्षक, जो अपनी कक्षा का पीछा करता है

शोपियां के दुबजन के आसपास सुबह का वक्त है। नीचे मुगल रोड पर आवाजाही शुरू हो रही है, लेकिन पहाड़ों की ओर जाने वाली पगडंडियों पर एक शिक्षक अपनी पीठ पर किताबें, रजिस्टर, चॉक और पोर्टेबल ब्लैकबोर्ड लेकर आगे बढ़ रहा है। उसका मंजिल कोई पक्का स्कूल भवन नहीं, बल्कि पहाड़ों के बीच बसा एक अस्थायी पड़ाव है। आगे गुज्जर और बकरवाल परिवार अपने भेड़-बकरियों के साथ ऊंचे चरागाहों की ओर बढ़ रहे हैं। जहां परिवार रुकेंगे, वहीं बच्चों के लिए कक्षा शुरू होगी। परिवार आगे बढ़ेगा तो स्कूल भी आगे बढ़ेगा। यही इन शिक्षकों की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

कठिन पहाड़, आसान नहीं है यह सफर

इन शिक्षकों के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। ऊबड़-खाबड़ रास्ते, बदलता मौसम, घने जंगल, सीमित संचार सुविधाएं और कई बार लंबी पैदल यात्रा—इन सबके बीच उन्हें अपनी कक्षा तक पहुंचना होता है। लेकिन इन मुश्किलों के सामने उनका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है—कोई बच्चा शिक्षा से पीछे न छूटे। जहां सामान्य स्कूल की पहुंच मुश्किल हो जाती है, वहां ये शिक्षक अपनी मौजूदगी से शिक्षा की पहुंच कायम रखते हैं। उनके लिए ब्लैकबोर्ड का आकार या कक्षा की दीवारें महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण यह है कि बच्चे किताब खोलें, सवाल पूछें और आगे बढ़ने का सपना देखें।

खुले आसमान के नीचे सपनों की कक्षा

किसी पहाड़ी मैदान में छह साल का बच्चा पहली बार अक्षर लिखता है। उसके आसपास खुला आसमान है, दूर बर्फ से ढकी चोटियां हैं और पास ही परिवार के पशु चर रहे हैं। उस बच्चे के लिए वही मैदान उसका स्कूल है। एक अन्य बच्चा गणित का सवाल हल कर रहा है। उसके लिए यह केवल एक पाठ नहीं, बल्कि आगे की जिंदगी की तैयारी है। शायद कुछ वर्षों बाद यही बच्चा किसी बड़े स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय तक पहुंचे। उस सफर की पहली सीढ़ी इसी पहाड़ी चरागाह में रखी जा रही है। यही इन मौसमी कक्षाओं की असली ताकत है—वे केवल बच्चों को पढ़ाती नहीं, बल्कि उनके सपनों को उनके साथ आगे ले जाती हैं।

42 हजार बच्चों के सपनों की जिम्मेदारी

करीब 2,200 मौसमी शैक्षिक स्वयंसेवकों द्वारा 42,000 बच्चों तक शिक्षा पहुंचाना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह हजारों परिवारों के भविष्य से जुड़ा प्रयास है। घुमंतू जीवनशैली के कारण जिन बच्चों के लिए नियमित स्कूल तक पहुंचना कठिन है, उनके लिए यह व्यवस्था शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने का माध्यम बन रही है। इससे बच्चों को अपनी पारिवारिक और पारंपरिक जीवनशैली के साथ शिक्षा जारी रखने का अवसर मिलता है। यह पहल इस सोच को मजबूत करती है कि शिक्षा किसी स्थान की मोहताज नहीं होनी चाहिए। स्कूल की चार दीवारें जरूरी हो सकती हैं, लेकिन सीखने की इच्छा उनसे कहीं बड़ी होती है।

जहां पहुंचना मुश्किल है, वहां पहुंच रहे हैं शिक्षक

दूधपथरी से लेकर दुबजन और कश्मीर के अन्य ऊंचाई वाले चरागाहों तक, इन शिक्षकों का प्रयास एक प्रेरक संदेश देता है—दूरी शिक्षा के रास्ते में बाधा हो सकती है, लेकिन उसे रोक नहीं सकती। ये शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ा रहे। वे बच्चों को यह विश्वास दे रहे हैं कि उनका भविष्य उनके वर्तमान भौगोलिक हालात से तय नहीं होता। आज पहाड़ों में खुले आसमान के नीचे बैठा बच्चा कल किसी बड़े मंच पर खड़ा हो सकता है। आज हाथ में पकड़ी छोटी सी किताब कल उसके लिए नई दुनिया का दरवाजा खोल सकती है। और उस सफर की शुरुआत उन शिक्षकों से होती है, जो हर गर्मी अपने स्कूल को अपने साथ लेकर पहाड़ों की ओर निकल पड़ते हैं।

कश्मीर की इन पहाड़ियों में चलती हुई ये कक्षाएं एक खूबसूरत संदेश देती हैं—जहां तक बच्चे पहुंच नहीं सकते, वहां तक शिक्षा जरूर पहुंच सकती है। क्योंकि सच्ची शिक्षा वही है, जो रास्ते नहीं देखती, बल्कि रास्ते बनाती है।

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