5 अगस्त 2026 को जम्मू-कश्मीर उस अहम तारीख़ के सात बरस मुकम्मल कर रहा है, जिसने 5 अगस्त 2019 को वादी के सियासी और इंतिज़ामी मंज़रनामे में एक नया बाब खोल दिया था। अनुच्छेद 370 और 35ए के निष्प्रभावी होने के बाद जम्मू-कश्मीर ने एक नए संवैधानिक और इंतिज़ामी निज़ाम की तरफ़ क़दम बढ़ाया। आज, सात बरस बाद, यह मौक़ा सिर्फ़ एक तारीख़ को याद करने का नहीं, बल्कि इस बात का जायज़ा लेने का भी है कि इन सालों में वादी ने तरक़्क़ी, अमन और खुशहाली की राह पर कितना सफ़र तय किया है।
आज जम्मू-कश्मीर में बेहतर सड़क और रेल राब्ता, आधुनिक बुनियादी ढांचा, रिकॉर्ड सैलानी, नई तालीमी सहूलतें, डिजिटल ख़िदमात और जमीनी सतह पर मज़बूत होती अवामी नुमाइंदगी एक नई तस्वीर पेश कर रही है। चुनौतियाँ अपनी जगह मौजूद हैं, लेकिन अवाम की उम्मीदें अब एक ऐसे मुस्तक़बिल से जुड़ रही हैं जहाँ अमन, तरक़्क़ी और ख़ुद-इक्तिफ़ाई (आत्मनिर्भरता) साथ-साथ आगे बढ़ें।
अनुच्छेद 370 और 35ए क्या थे?
सन 1947 में भारत के साथ हुए इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन के बाद जम्मू-कश्मीर और भारत के संवैधानिक रिश्तों की बुनियाद रखी गई। भारतीय संविधान में शामिल अनुच्छेद 370 के तहत तत्कालीन राज्य को एक ख़ास संवैधानिक हैसियत हासिल थी। इसके ज़रिये राज्य का अपना संविधान था और कुछ मामलों में उसे विशेष इख़्तियार हासिल थे।
इसके बाद 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के ज़रिये अनुच्छेद 35ए लागू किया गया, जिसके तहत तत्कालीन विधानसभा को "स्थायी निवासी" तय करने और उन्हें सरकारी मुलाज़मत, ज़मीन की मिल्कियत, छात्रवृत्ति और दूसरी कुछ रियायतें देने का इख़्तियार मिला। कई दशकों तक यही प्रावधान जम्मू-कश्मीर की सियासत और इंतिज़ामी ढांचे का अहम हिस्सा बने रहे।
एक नया संवैधानिक मोड़
5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने संवैधानिक आदेश जारी कर अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बना दिया, जबकि 35ए भी प्रभावहीन हो गया। इसके साथ संसद ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 मंज़ूर किया, जिसके तहत पूर्व राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेश—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में तक़सीम किया गया।
इन फ़ैसलों के बाद भारतीय संविधान पूरी तरह जम्मू-कश्मीर में लागू हुआ और कई केंद्रीय क़ानूनों व अवामी फ़लाह-ओ-बहबूद (जनकल्याण) की योजनाओं का दायरा भी यहाँ तक वसीअ (व्यापक) हुआ। उस वक़्त इस फ़ैसले पर मुल्क भर में सियासी बहस हुई, लेकिन इसके साथ ही इंतिज़ामी निज़ाम के एक नए दौर की भी शुरुआत हुई।
सात बरस की तरक़्क़ी
इन सात सालों में बुनियादी ढांचे का विकास सबसे ज़्यादा नज़र आने वाला बदलाव बनकर सामने आया है।
उधमपुर–श्रीनगर–बारामूला रेल लिंक (यूएसबीआरएल) के मुकम्मल होने से कश्मीर घाटी का रेल राब्ता पूरे मुल्क से पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत हुआ है। इसी परियोजना का हिस्सा चिनाब रेल पुल, जिसे दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे आर्च ब्रिज माना जाता है, आधुनिक इंजीनियरिंग और नए भारत की तरक़्क़ी की एक बड़ी मिसाल बनकर उभरा है।
नई सड़कें, सुरंगें और बेहतर ग्रामीण सड़क नेटवर्क ने सफ़र और कारोबार—दोनों को आसान बनाया है। ज़ोजिला सुरंग जैसी परियोजनाओं से उम्मीद है कि कश्मीर और लद्दाख के बीच पूरे साल आवाजाही आसान होगी, जिससे मुआशी (आर्थिक) गतिविधियों को भी नई रफ़्तार मिलेगी।
डिजिटल इंफ़्रास्ट्रक्चर में भी काफ़ी बेहतरी आई है। इंटरनेट सेवाओं का दायरा बढ़ा है, ई-गवर्नेंस को बढ़ावा मिला है और सरकारी ख़िदमात अब लोगों तक पहले से कहीं आसान तरीक़े से पहुँच रही हैं।
सैलानी बढ़े, कारोबार बढ़ा
पर्यटन आज जम्मू-कश्मीर की मुआशी तरक़्क़ी का अहम सहारा बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में श्रीनगर, गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग और उत्तर कश्मीर की ख़ूबसूरत वादियों में रिकॉर्ड तादाद में सैलानी पहुँचे हैं।
होम-स्टे, इको-टूरिज़्म, एडवेंचर स्पोर्ट्स और विंटर टूरिज़्म जैसी नई पहल ने स्थानीय नौजवानों के लिए रोज़गार के नए दरवाज़े खोले हैं।
दूसरी तरफ़ कालीन, पश्मीना, लकड़ी की नक्काशी, हथकरघा, बाग़बानी और सेब की खेती जैसे पारंपरिक पेशे अब भी लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का अहम ज़रिया बने हुए हैं। लैवेंडर की खेती, फ्लोरीकल्चर और स्थानीय कारोबार को बढ़ावा देने वाली योजनाओं ने ग्रामीण इलाक़ों में आमदनी के नए रास्ते भी खोले हैं।
सुशासन और अवामी फ़लाह
इन सात बरसों में हुकूमत ने जमीनी सतह पर अवामी हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी ख़ास तवज्जो दी है। पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों की भूमिका पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत हुई है, जबकि डिजिटल इंतिज़ाम ने सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बेहतर बनाया है।
आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन, पीएम-किसान, प्रधानमंत्री आवास योजना और महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों जैसी कई केंद्रीय योजनाओं का फ़ायदा अब प्रदेश के ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँच रहा है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, नए तालीमी इदारे, स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम और व्यावसायिक प्रशिक्षण ने समाज के अलग-अलग तबकों को नए मौक़े फ़राहम किए हैं।
नौजवानों की नई सोच
अगर किसी एक बदलाव को सबसे अहम कहा जाए तो वह जम्मू-कश्मीर के नौजवानों की बदलती सोच और बढ़ती उम्मीदें हैं।
आज वादी के युवा स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं, मुल्क के नामी तालीमी इदारों में पढ़ाई कर रहे हैं, खेल के मैदानों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं और टेक्नोलॉजी व डिजिटल इनोवेशन को अपनाकर नए मुक़ाम हासिल कर रहे हैं।
उद्यमिता, हुनरमंदी और नवाचार को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ नौजवानों को स्वरोज़गार और बेहतर मुस्तक़बिल की तरफ़ ले जा रही हैं। आने वाले बरसों में जम्मू-कश्मीर की असली ताक़त यही नौजवान होंगे, जिन्हें बेहतर तालीम, रोज़गार और नए मौक़ों की ज़रूरत होगी।
आगे की राह
बेशक, पिछले सात सालों में कई अहम मंज़िलें हासिल हुई हैं, लेकिन सफ़र अभी जारी है। रोज़गार के नए अवसर, निजी निवेश, पर्यावरण का तहफ़्फ़ुज़, टिकाऊ पर्यटन और कश्मीर की सदियों पुरानी तहज़ीब और सांस्कृतिक विरासत की हिफ़ाज़त आने वाले दौर की बड़ी ज़िम्मेदारियाँ रहेंगी।
इस लिहाज़ से 5 अगस्त सिर्फ़ एक संवैधानिक तब्दीली की सालगिरह नहीं, बल्कि यह देखने का भी मौक़ा है कि विकास, सुशासन और अवामी फ़लाह के मैदान में जम्मू-कश्मीर ने कितना सफ़र तय किया है और आगे किन मंज़िलों की तरफ़ बढ़ना है।
आज जम्मू-कश्मीर एक ऐसे दौर में दाख़िल हो चुका है जहाँ बेहतर राब्ता, मज़बूत इदारे, बढ़ते मुआशी मौक़े और अमन-ओ-अमान के साथ एक रौशन मुस्तक़बिल की उम्मीदें पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत दिखाई देती हैं। सात बरस पहले शुरू हुआ बदलाव का यह सफ़र अब तरक़्क़ी, एतमाद और नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रहा है।

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