इस दौरे के दौरान बच्चों को अमन सेतु की तारीख़, उसकी अहमियत और सरहदी इलाक़े में उसके मक़ाम के बारे में आसान और दिलचस्प अंदाज़ में मालूमात दी गई। ख़ास ज़रूरतों वाले बच्चों की सहूलियत का पूरा ख़याल रखा गया ताकि हर बच्चा इस तजुर्बे का हिस्सा बन सके। फ़ौज के जवान और मौजूद स्टाफ़ ने बच्चों की रहनुमाई की और पूरे सफ़र के दौरान उन्हें हर मुमकिन मदद फ़राहम की।
बच्चों ने इस तालीमी दौरे के दौरान काफ़ी जोश और ख़ुशी का इज़हार किया। उनके लिए यह महज़ एक सैर नहीं बल्कि सीखने, समझने और नई जगहों से रूबरू होने का बेहतरीन मौक़ा साबित हुआ। बच्चों ने फ़ौज के जवानों से बातचीत की, उनके कामकाज के बारे में जाना और मुल्क की हिफ़ाज़त में निभाई जा रही ज़िम्मेदारियों को भी क़रीब से समझने की कोशिश की।
माहिरीन का कहना है कि इस तरह के तालीमी दौरों से ख़ास ज़रूरतों वाले बच्चों का एतमाद बढ़ता है, उनकी समाजी शिरकत मज़बूत होती है और उन्हें बराबरी के मौक़े मिलने का एहसास होता है। यह पहल इस बात की मिसाल है कि तालीम सिर्फ़ किताबों तक महदूद नहीं होती, बल्कि अमली तजुर्बे भी बच्चों की शख़्सियत की तामीर में अहम किरदार अदा करते हैं।
भारतीय फ़ौज ने बरसों से जम्मू-कश्मीर में सिक्योरिटी ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ इंसानी ख़िदमत, नौजवानों की रहनुमाई, तालीमी सरगर्मियों, खेल-कूद और समाजी बेहतरी से जुड़ी कई पहलों में भी हिस्सा लिया है। यह ताज़ा तालीमी दौरा उसी सिलसिले की एक अहम कड़ी माना जा रहा है, जिसमें ख़ास ज़रूरतों वाले बच्चों को तरजीह देकर यह पैग़ाम दिया गया कि समाज का हर फ़र्द बराबर अहमियत रखता है।
इलाक़े के लोगों और बच्चों के सरपरस्तों ने भी इस क़दम की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रोग्राम बच्चों में नई उम्मीद पैदा करते हैं और उन्हें ख़ुद पर यक़ीन करने का हौसला देते हैं। उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि आगे भी इस तरह की तालीमी और समाजी सरगर्मियाँ जारी रहेंगी ताकि ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे इन मौक़ों से फ़ायदा उठा सकें।
यह तालीमी दौरा एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि जम्मू-कश्मीर में अमन, तालीम और इंसानी हमदर्दी को मज़बूत करने की कोशिशें लगातार जारी हैं। ख़ास ज़रूरतों वाले बच्चों को नई दुनिया से रूबरू कराने की यह पहल न सिर्फ़ उनकी तालीमी तरक़्क़ी के लिए अहम है, बल्कि एक पुरअमन, समावेशी और उम्मीद से भरे कश्मीर की तस्वीर भी पेश करती है।


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