व्याख्यान के दौरान इस बात पर ज़ोर दिया गया कि नशे की लत किसी एक शख़्स का मसला नहीं बल्कि पूरे ख़ानदान और समाज को मुतास्सिर करने वाली एक गंभीर चुनौती है। वक्ताओं ने बताया कि अगर शुरुआती मरहले में ही नशे की आदत की पहचान कर ली जाए और वक़्त रहते सही रहनुमाई और इलाज मुहैया कराया जाए तो कई ज़िंदगियों को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है। इसी वजह से अर्ली इंटरवेंशन (शुरुआती हस्तक्षेप) को नशे के ख़िलाफ़ सबसे असरदार हथियार बताया गया।
कार्यक्रम में मौजूद नौजवानों को समझाया गया कि ज़िंदगी में कामयाबी हासिल करने का रास्ता मेहनत, तालीम, खेल-कूद, हुनर और अच्छे अख़लाक़ से होकर गुज़रता है, जबकि नशा इंसान की सेहत, तालीमी सफ़र, रोज़गार और ख़ानदानी रिश्तों को तबाह कर देता है। उन्हें अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले सोच-समझकर लेने और हर उस चीज़ से दूर रहने की नसीहत दी गई जो उनके मुस्तक़बिल को नुक़सान पहुँचा सकती है।
इस दौरान वालिदैन और समाज के ज़िम्मेदार अफ़राद के किरदार पर भी ख़ास तवज्जो दी गई। वक्ताओं ने कहा कि बच्चों और नौजवानों की बेहतर परवरिश, उनसे खुलकर बातचीत, उनकी गतिविधियों पर नज़र और वक़्त पर सही मशवरा देना नशे जैसी बुराई को रोकने में बेहद अहम है। उन्होंने कहा कि जब घर, स्कूल, समाज और प्रशासन एक साथ मिलकर काम करते हैं, तब ही नशे के नेटवर्क को जड़ से ख़त्म किया जा सकता है।
भारतीय फ़ौज के अफ़सरान ने अपने ख़िताब में कहा कि फ़ौज सिर्फ़ सरहदों की हिफ़ाज़त तक महदूद नहीं है, बल्कि अवाम की भलाई, नौजवानों के बेहतर मुस्तक़बिल और समाज में अमन व तरक़्क़ी को फ़रोग़ देना भी उसकी अहम ज़िम्मेदारियों में शामिल है। इसी सोच के तहत वादी के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में वक़्त-ब-वक़्त जागरूकता कार्यक्रम, खेल मुकाबले, तालीमी गतिविधियाँ और समाजी मुहिमें आयोजित की जाती हैं, ताकि नौजवान सही राह इख़्तियार करें और अपने ख़्वाबों को हक़ीक़त में बदल सकें।
मक़ामी लोगों ने भी इस जागरूकता मुहिम का इस्तक़बाल करते हुए कहा कि आज के दौर में नशे के ख़िलाफ़ सिर्फ़ क़ानूनी कार्रवाई ही काफ़ी नहीं, बल्कि लगातार जागरूकता, रहनुमाई और समाजी भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है। उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि ऐसे कार्यक्रम नौजवानों को ग़लत रास्तों से बचाने और उन्हें तालीम, खेल, रोज़गार और बेहतर ज़िंदगी की तरफ़ मुतवज्जेह करने में अहम किरदार अदा करेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि नशा मुक्त समाज की बुनियाद जागरूकता, भरोसे और सामूहिक ज़िम्मेदारी पर टिकी होती है। जब हर फ़र्द अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए इस मुहिम का हिस्सा बनेगा, तभी आने वाली नस्लों को इस बुराई से महफ़ूज़ रखा जा सकेगा। भारतीय फ़ौज की यह पहल भी इसी सोच की अक्कासी करती है कि "आगाही ही बचाव का सबसे बड़ा ज़रिया है।"
"नशा मुक्त कश्मीर" के विज़न को मज़बूत करने वाली यह मुहिम इस बात का पैग़ाम देती है कि एक सेहतमंद समाज की तामीर सिर्फ़ सरकारी कोशिशों से नहीं, बल्कि अवाम, ख़ानदान, तालीमी इदारों और समाज के हर तबक़े की मुश्तरका ज़िम्मेदारी से मुमकिन है। जब नौजवान इल्म, हौसले और सही रहनुमाई के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी कश्मीर का मुस्तक़बिल ज़्यादा महफ़ूज़, पुरअमन और तरक़्क़ीयाफ़्ता बन सकेगा।


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