बलोचिस्तान के ख़ुश्क पहाड़ों और फैले हुए वीरान रेगिस्तानों ने अपनी गोद में एक ऐसी गहरी त्रासदी छुपा रखी है, जो वहाँ के अस्ल बाशिंदों के ख़ून से लिखी गई है और दुनिया की बेरुख़ी के साये में धुंधला दी गई है। यह एक ऐसी दिलकश और हैरतअंगेज़ सरज़मीन है जहाँ ज़मीन के सीने में सोने की नसें और बेशुमार ऊर्जा के ख़ज़ाने मौजूद हैं, मगर अफ़सोस कि इसी धरती पर चलने वाले लोग अपनी ज़िंदगी इज़्ज़त और इंसानी वक़ार के साथ गुज़ारने के बुनियादी हक़ से महरूम रखे गए हैं।
यह ख़ूबसूरत मगर सख़्त-मिज़ाज पहाड़ी इलाक़ा आज एक लम्बी जद्दोजहद का मैदान बना हुआ है — एक तरफ़ वह मरकज़ी रियासत है जो अपनी ज़मीनी पकड़ और इख़्तियार को सबसे ऊपर रखती है, और दूसरी तरफ़ एक पुरानी, ख़ुददार क़ौम है जो अपने वजूद, अपनी पहचान और अपनी तहज़ीबी विरासत को बचाने की कोशिश कर रही है।
बलोचों के दर्द और बेगानगी की गहराई को समझने के लिए हमें तारीख़ के उन सफ़हों को पलटना होगा जहाँ भारतीय उपमहाद्वीप की तक़सीम के बाद का तूफ़ानी दौर दर्ज है। इस अलगाव और बेचैनी की जड़ें 1948 के बहार के मौसम में ख़ानत-ए-कलात के विवादित विलय तक जाती हैं।
तारीखी रिकॉर्ड बताते हैं कि ख़ान-ए-कलात ने शुरुआत में अपनी आज़ादी का ऐलान किया था। उन्होंने एक पार्लियामेंट क़ायम की और नए बनने वाले मुल्क पाकिस्तान के साथ दोस्ताना ताल्लुक़ात रखने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। लेकिन ख़ुदमुख़्तारी का यह छोटा-सा दौर उस वक़्त ख़त्म हो गया जब पाकिस्तान हुकूमत ने कलात की सरहदों की तरफ़ अपनी फ़ौजी ताक़त रवाना की और दबाव के ज़रिये विलय के दस्तावेज़ पर दस्तख़त करवाए गए।
यही शुरुआती शिकायत आगे चलकर एक ऐसे संघर्ष का सबब बनी जो दशकों तक जारी रहा। आने वाले वर्षों में बलोच प्रतिरोध ने पाँच बड़े सशस्त्र दौर देखे, और हर बार इस मुख़ालिफ़त का जवाब भारी फ़ौजी ताक़त के इस्तेमाल से दिया गया। मक़सद यह था कि बलोच क़ौम की अलग सियासी पहचान और उसकी आवाज़ को दबा दिया जाए।
बलोच लोगों के जायज़ मुतालिबात के जवाब में पाकिस्तानी रियासती ढाँचे ने अक्सर लोकतांत्रिक बातचीत का रास्ता अख़्तियार करने के बजाय एक ऐसे ख़ौफ़ के निज़ाम को जन्म दिया, जिसे कई अंतरराष्ट्रीय निगरान संस्थाएँ एक ख़ामोश क़त्लेआम से ताबीर करती हैं।
इस अधीनता और दर्दनाक हालात की सबसे तकलीफ़देह तस्वीर जबरन गुमशुदगियों की है, जो बड़े पैमाने पर एक संगठित अमल की शक्ल इख़्तियार कर चुकी हैं। सामाजिक कार्यकर्ता, तालिब-ए-इल्म, सहाफ़ी और इंसानी हक़ूक़ के पैरोकार अक्सर दिन-दहाड़े सुरक्षा संस्थाओं और ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा उठा लिए जाते हैं।
इन लोगों को ऐसे पुरअसरार हिरासत केंद्रों में डाल दिया जाता है जहाँ शदीद ज़ुल्म और टॉर्चर की शिकायतें सामने आती रही हैं। दूसरी तरफ़ उनके घर वाले एक कभी ख़त्म न होने वाली बेचैनी और इंतज़ार की ज़िंदगी गुज़ारते हैं। वे सड़कों पर अपने प्यारे लोगों की तलाश में आवाज़ उठाते हैं, जबकि सरकारी अधिकारी अक्सर उनके बारे में किसी भी जानकारी से इनकार करते हैं।
इंसानी हक़ूक़ की तंजीमों ने ऐसे कई मामलों को दर्ज किया है जहाँ इन गुमशुदगियों का अंत दर्दनाक तरीक़े से लाशें बरामद होने और डर पैदा करने वाली कार्रवाइयों में हुआ, जिसने पूरे समाज में ख़ौफ़ और असुरक्षा की फ़िज़ा पैदा कर दी।
बलोच लोगों के जिस्मानी ख़ात्मे की यह मुहिम सिर्फ़ फ़ौजी दबाव तक महदूद नहीं रही, बल्कि इसके साथ एक गहरा आर्थिक ढाँचा भी जुड़ा हुआ है, जिसमें इलाक़े के वसाइल (संसाधनों) का लगातार दोहन शामिल है।
इस सरज़मीन के आर्थिक शोषण की सबसे साफ़ मिसाल 1952 में बलोचिस्तान के शहर सुई में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों की खोज है। दशकों तक बलोचिस्तान से निकाली जाने वाली यह बेशुमार ऊर्जा पंजाब और सिंध जैसे सूबों की तेज़ रफ़्तार औद्योगिक तरक़्क़ी और आर्थिक ख़ुशहाली का ज़रिया बनी।
मगर दूसरी तरफ़, उन्हीं गैस के कुओं से कुछ ही मील दूर रहने वाले स्थानीय लोग इस बुनियादी सहूलत से भी महरूम रहे। बहुत से बलोच परिवारों को अपने घरों के चूल्हे जलाने के लिए लकड़ी और कोयले पर निर्भर रहना पड़ा।
जटिल क़ीमत निर्धारण नीतियों और संविधान में मौजूद स्थानीय वसाइल पर स्थानीय लोगों की प्राथमिकता से जुड़े वादों की अनदेखी के ज़रिये ऐसा निज़ाम बनाया गया जिसमें मुल्क का सबसे कम विकसित सूबा पूरे देश की तरक़्क़ी को सहारा देता रहा, मगर ख़ुद बुनियादी सहूलियतों से वंचित रहा।
आज के दौर में शोषण का यह मैदान और भी बड़ा हो चुका है, जहाँ वैश्विक सियासी ताक़तों की बढ़ती हुई ज़रूरतों और भू-राजनीतिक दिलचस्पियों ने एक नया अध्याय खोल दिया है।
बलोचिस्तान का समुंदरी शहर ग्वादर अरबों डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एक अहम हिस्सा और ताज का नगीना बताया जाता है। मगर स्थानीय बलोच मछुआरे अपनी रोज़ी-रोटी को तबाह होते देख रहे हैं। विदेशी औद्योगिक मछली पकड़ने वाले जहाज़ों और भारी सुरक्षा चौकियों ने उनके सदियों पुराने रोज़गार को गंभीर नुक़सान पहुँचाया है।
इसी तरह अंदरूनी रेगिस्तानी इलाक़ों में मौजूद खनिज दौलत पर भी बाहरी ताक़तों की नज़र है। पश्चिमी पूँजी और कंपनियाँ विशाल रेको दिक तांबा और सोना भंडारों से फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं, ताकि वैश्विक स्तर पर ज़रूरी खनिजों की आपूर्ति को सुरक्षित किया जा सके।
मगर इन ख़ज़ानों से निकलने वाली दौलत का बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों और इस्लामाबाद की मरकज़ी हुकूमत तक पहुँचता है, जबकि स्थानीय आबादी को पर्यावरणीय तबाही, बेदखली, विस्थापन और उन कड़ी सुरक्षा व्यवस्थाओं का बोझ उठाना पड़ता है जो इन बाहरी निवेशों की हिफ़ाज़त के लिए खड़ी की गई हैं।
सियासी रास्तों के बंद हो जाने और लगातार जारी रियासती दबाव ने बलोचिस्तान की नई नस्ल को अपनी जद्दोजहद का तरीक़ा बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब यह प्रतिरोध एक ज़्यादा संगठित और विचारधारा पर आधारित गुरिल्ला संघर्ष की शक्ल ले चुका है, जिसकी अगुवाई शिक्षित मध्यवर्ग के लोग कर रहे हैं।
बलोच लिबरेशन आर्मी और बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट जैसे हथियारबंद गुटों ने अपनी कार्रवाइयों को ज़्यादा संगठित करते हुए रियासती ढाँचे और विदेशी निवेश से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया है।
बेहद दर्दनाक बात यह है कि अपनी मायूसी और बेबसी की इंतिहा में कुछ धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी गुटों ने आत्मघाती हमलों जैसी इंतिहाई रणनीतियाँ भी अपनाईं, जिनमें पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी शामिल रही हैं।
यह बदलाव किसी मज़हबी जुनून की पैदावार नहीं, बल्कि उस गहरी नाकामी का नतीजा बताया जाता है जहाँ रियासत बलोच लोगों के बुनियादी हक़ूक़ और उनकी पहचान को समझने और स्वीकार करने में नाकाम रही।
रियासती दबाव की भारी ताक़त, सियासी रास्तों की बंदिश और हिंसा के लगातार माहौल के बावजूद बलोच लोगों की हिम्मत और इस्तिक़ामत (दृढ़ता) एक असाधारण मिसाल बनी हुई है।
जब बलोचिस्तान के मर्दों को पुरअसरार हिरासतों और गुमनामी के अंधेरों में गुम कर दिया जाता है, तो वहाँ की औरतें अदम्य हौसले के साथ इंसाफ़ की मशाल उठाकर सामने आती हैं।
डॉक्टर माह रंग बलोच जैसे रहनुमाओं ने हज़ारों औरतों और बच्चों को संगठित किया है। उन्होंने लंबे पैदल मार्चों के ज़रिये अपनी आवाज़ को बुलंद किया और सैकड़ों मील का सफ़र तय करके संघीय राजधानी तक पहुँचीं, ताकि अपने गुमशुदा भाइयों और पिताओं के लिए जवाबदेही और इंसाफ़ का मुतालबा कर सकें।
इसी तरह ग्वादर में हक़ दो तहरीक जैसे अवामी हक़ूक़ के आंदोलनों ने पुरअमन इज्तिमाई ताक़त की एक बड़ी मिसाल पेश की। इन स्थानीय आंदोलनों ने हज़ारों लोगों को एक साथ खड़ा किया, जिन्होंने अपने बुनियादी हक़ूक़, रोज़गार के तहफ़्फ़ुज़ और आर्थिक लूट के ख़ात्मे की आवाज़ बुलंद की।
इस लंबे संघर्ष का मनोवैज्ञानिक बोझ आम लोगों के दिलों और ज़ेहनों पर बहुत गहरा असर डाल चुका है। बलोचिस्तान के लोग हर रोज़ ऐसी हक़ीक़त का सामना करते हैं जहाँ निगरानी, भारी फ़ौजी मौजूदगी और अचानक होने वाली हिंसा का ख़ौफ़ उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है।
पाकिस्तानी हुकूमती ढाँचा अक्सर मीडिया पाबंदियों और सरकारी नैरेटिव के ज़रिये इस दर्द को छुपाने की कोशिश करता है। जायज़ नस्ली, सांस्कृतिक और क़ौमी पहचान से जुड़े सवालों को कई बार बाहरी ताक़तों की साज़िश या विदेशी मदद से चलने वाली दहशतगर्दी के तौर पर पेश किया जाता है।
इस तरह एक ऐसा दोहरा चेहरा सामने आता है जिसमें बाहर की दुनिया के सामने देशभक्ति और स्थिरता की तस्वीर दिखाई जाती है, जबकि समाज के अंदर लोग अपने खोए हुए अज़ीज़ों, टूटे हुए ख़्वाबों और दबे हुए दर्द के साथ ख़ामोश ज़िंदगी गुज़ारते हैं।
लेकिन बलोच लोगों की सामूहिक याददाश्त और उनकी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को मिटाना आसान नहीं है। उनकी ज़बान, उनकी रवायतें और उनकी पहचान उन ताक़तों के सामने एक मज़बूत दीवार की तरह खड़ी हैं जो उन्हें सांस्कृतिक रूप से अपने अंदर समाहित या कमज़ोर करना चाहती हैं।
यह ख़ामोश मगर मज़बूत रवैया दुनिया को याद दिलाता है कि किसी भी क़ौम की असली ताक़त सिर्फ़ हथियारों या सत्ता में नहीं होती, बल्कि उसकी यादों, उसकी संस्कृति और अपने वजूद से जुड़ी गहरी मोहब्बत में होती है।
बलोचिस्तान की यह तारीक हक़ीक़त उस हुकूमती मॉडल पर एक गंभीर सवाल उठाती है जो इंसानी ज़िंदगी की पवित्रता और इज़्ज़त से ज़्यादा दौलत और वसाइल की निकासी को अहमियत देता है।
इस्लामाबाद की संघीय हुकूमत को यह समझना होगा कि सिर्फ़ फ़ौजी ताक़त, सख़्ती और ग़ैर-क़ानूनी कार्रवाइयों के ज़रिये किसी क़ौम के दिल में मौजूद आज़ादी, इज़्ज़त और इंसानी वक़ार की बुनियादी ख़्वाहिश को हमेशा के लिए ख़त्म नहीं किया जा सकता।
बलोच लोगों ने अपने वजूद और अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए एक अकल्पनीय क़ीमत अदा की है। उन्होंने दशकों तक मुश्किल हालात, ज़ुल्म और बेइंसाफ़ी का सामना किया, मगर इसके बावजूद अपनी समृद्ध संस्कृति, अपनी ख़ुद्दारी और अपनी अलग पहचान को क़ायम रखा।
उनकी जद्दोजहद इस बात की गवाही देती है कि बेहद सख़्त और अंधेरे हालात में भी उम्मीद की रौशनी बाक़ी रह सकती है। किसी भी इंसानी समाज की ताक़त सिर्फ़ उसकी दौलत या सियासी ताक़त में नहीं होती, बल्कि अपने हक़ूक़, अपनी पहचान और इंसाफ़ के लिए खड़े रहने के हौसले में होती है।
जब तक दुनिया की बिरादरी बलोचिस्तान में जारी इस ख़ामोश पीड़ा को गंभीरता से नहीं समझती और जब तक पाकिस्तानी रियासत अपने पुराने सख़्त रवैये और जबरदस्ती पर आधारित नीतियों का दोबारा जायज़ा नहीं लेती, तब तक बलोचिस्तान के सुनहरे पहाड़ और नीले समुंदर के किनारे एक दर्दनाक संघर्ष के मैदान बने रहेंगे।
लेकिन बलोच क़ौम की रूह उसकी अपनी पुश्तैनी सरज़मीन की चट्टानों की तरह मज़बूत है। यह रूह मौजूदा अंधेरे दौर से गुज़रते हुए भी बाक़ी रहेगी और आने वाले वक़्त में इंसाफ़ और अमन की सुबह की तरफ़ बढ़ती रहेगी।
बलोचिस्तान की कहानी सिर्फ़ एक इलाक़े की कहानी नहीं, बल्कि इंसानी इज़्ज़त, पहचान, हक़ूक़ और इंसाफ़ की तलाश की कहानी है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी भी समाज की आवाज़ को दबाया जा सकता है, मगर उसकी याद, उसकी संस्कृति और उसके वजूद की पुकार को हमेशा के लिए ख़ामोश नहीं किया जा सकता।


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