माहिरीन का कहना है कि पिछले कुछ बरसों से पाकिस्तान समर्थित डिजिटल नेटवर्क लगातार ऐसे नैरेटिव गढ़ रहे हैं, जिनका मक़सद जम्मू-कश्मीर की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमज़ोर करना और लोगों का भरोसा संवैधानिक संस्थाओं से उठाना है। "कश्मीर फाइट" पर पहले भी कई बार भ्रामक और एकतरफ़ा सामग्री प्रसारित करने के आरोप लगते रहे हैं। ताज़ा पोस्टर को भी उसी सिलसिले की अगली कड़ी माना जा रहा है।
सुरक्षा विश्लेषकों के मुताबिक़, जब भी जम्मू-कश्मीर में अमन, तरक़्क़ी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया मज़बूत होती दिखाई देती है, तब ऐसे प्रोपेगेंडा अभियान तेज़ कर दिए जाते हैं। इनका मक़सद यह संदेश देना होता है कि मुख्यधारा की सियासत अवाम की नुमाइंदगी नहीं करती, ताकि लोगों के दिलों में शक पैदा हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उनका एतिमाद कमज़ोर पड़े।
जानकारों का कहना है कि यह दुष्प्रचार केवल किसी एक पार्टी के खिलाफ़ नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक निज़ाम को बदनाम करने की कोशिश है। अगर जनता अपने चुने हुए नुमाइंदों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा खो दे, तो कट्टरपंथी और अलगाववादी तत्वों को अपने एजेंडे के लिए ज़मीन तैयार करने में आसानी होती है। यही वजह है कि सोशल मीडिया के ज़रिये फैलाए जाने वाले ऐसे संदेशों को गंभीरता से देखा जा रहा है।
डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आज की लड़ाई सिर्फ़ सरहदों पर नहीं, बल्कि मोबाइल फ़ोन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी लड़ी जा रही है। फ़र्ज़ी पोस्टर, आधी-अधूरी जानकारी, मनगढ़ंत दावे और भावनात्मक संदेशों के ज़रिये लोगों की सोच को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। ऐसे अभियानों का उद्देश्य तथ्यों के बजाय भावनाओं को भड़काना होता है।
विशेषज्ञ नागरिकों से अपील कर रहे हैं कि किसी भी पोस्ट, वीडियो या संदेश को बिना सत्यापन के साझा न करें। किसी भी सनसनीखेज़ दावे पर भरोसा करने से पहले विश्वसनीय समाचार स्रोतों और आधिकारिक जानकारी की पुष्टि करना बेहद ज़रूरी है। अफ़वाहों और भ्रामक सामग्री को आगे बढ़ाना अनजाने में दुष्प्रचार फैलाने वालों की मदद कर सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की मज़बूती, चुनावी प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी और विकास की दिशा में बढ़ते क़दम कुछ ऐसे तत्वों को रास नहीं आते, जो अस्थिरता और अविश्वास का माहौल बनाना चाहते हैं। ऐसे में डिजिटल माध्यमों पर चलाए जा रहे प्रोपेगेंडा अभियानों को समझना और उनकी हक़ीक़त पहचानना समय की अहम ज़रूरत है।
आख़िर में विशेषज्ञ यही कहते हैं कि कश्मीर की अवाम ने मुश्किल दौर देखे हैं और अब शांति, तरक़्क़ी और लोकतांत्रिक भागीदारी की राह पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में फ़र्ज़ी नैरेटिव, दुष्प्रचार और सोशल मीडिया आधारित मनोवैज्ञानिक अभियानों से सतर्क रहना हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है। जागरूक समाज ही अफ़वाहों और दुष्प्रचार का सबसे मज़बूत जवाब साबित हो सकता है।


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