डिजिटल साक्षरता कार्यशाला से कश्मीर के छात्रों और दस्तकारों को मिली नई पहचान


श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में डिजिटल सशक्तिकरण और हुनरमंद नौजवानों को नए मौक़े फ़राहम करने की दिशा में एक अहम पहल के तहत दो दिवसीय डिजिटल लिटरेसी और मार्केट रेडीनेस वर्कशॉप का सफल आयोजन किया गया। यह कार्यशाला आर्टिजन 2.0 पहल के तहत कंज़र्व इंडिया फ़ाउंडेशन और भारतीय सेना के सहयोग से आयोजित की गई, जिसका मक़सद कश्मीर के छात्रों और स्थानीय दस्तकारों को डिजिटल दुनिया से जोड़ना, उनके हुनर को नई पहचान दिलाना और उन्हें देश-विदेश के बाज़ारों तक पहुंचाने के लिए तैयार करना था।

इस कार्यशाला में बड़ी तादाद में छात्रों, युवा उद्यमियों और पारंपरिक हस्तशिल्प से जुड़े दस्तकारों ने शिरकत की। माहिर प्रशिक्षकों ने उन्हें डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन कारोबार, सोशल मीडिया मार्केटिंग, ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल भुगतान प्रणाली, उत्पादों की बेहतर प्रस्तुति और ग्राहकों तक सीधे पहुंच बनाने जैसे अहम विषयों पर तफ़सील से जानकारी दी। साथ ही प्रतिभागियों को यह भी बताया गया कि किस तरह आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके अपने हुनर को रोज़गार और बेहतर आमदनी में तब्दील किया जा सकता है।

वर्कशॉप के दौरान दस्तकारों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता, आकर्षक पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाज़ार की ज़रूरतों के मुताबिक़ उत्पाद तैयार करने की बारीकियां भी सिखाई गईं। विशेषज्ञों ने समझाया कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए स्थानीय हस्तशिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इससे न केवल कश्मीरी दस्तकारों की आमदनी में इज़ाफ़ा होगा, बल्कि घाटी की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत को भी नई पहचान मिलेगी।

कार्यक्रम का सबसे अहम हिस्सा आर्टिजन-बायर लिंकिज रहा, जहां स्थानीय दस्तकारों को संभावित ख़रीदारों और बाज़ार विशेषज्ञों से जोड़ने की कोशिश की गई। इस पहल का मक़सद बिचौलियों पर निर्भरता कम करना और दस्तकारों को सीधे ग्राहकों तक पहुंच उपलब्ध कराना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल से स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ेगी, नए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे और कश्मीर की अर्थव्यवस्था को भी मज़बूती मिलेगी।

छात्रों ने भी इस कार्यशाला को अपने भविष्य के लिए बेहद मुफ़ीद बताया। उनका कहना था कि आज के दौर में डिजिटल जानकारी और तकनीकी कौशल हर नौजवान की ज़रूरत बन चुके हैं। इस प्रशिक्षण ने उन्हें नई तकनीकों को समझने और अपने करियर को नई दिशा देने का भरोसा दिया है। प्रतिभागियों ने उम्मीद ज़ाहिर की कि भविष्य में भी इस तरह के कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाएंगे ताकि ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को इसका फ़ायदा मिल सके।

कंज़र्व इंडिया फ़ाउंडेशन और भारतीय सेना की इस संयुक्त पहल को स्थानीय लोगों ने भी सराहा। उनका कहना है कि जब समाजसेवी संस्थाएं, प्रशासन और सुरक्षा बल मिलकर युवाओं और दस्तकारों के विकास के लिए काम करते हैं तो उससे पूरे समाज में तरक़्क़ी का माहौल बनता है। ऐसे कार्यक्रम युवाओं को सकारात्मक दिशा देने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनने की राह भी दिखाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सशक्तिकरण आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत है। अगर स्थानीय प्रतिभाओं को सही प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक और बेहतर बाज़ार उपलब्ध कराया जाए तो वे न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मज़बूत कर सकते हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के विकास में भी अहम किरदार निभा सकते हैं। कश्मीर के पारंपरिक हस्तशिल्प, कालीन, पश्मीना, पेपर माशे, लकड़ी की नक्काशी और दूसरे स्थानीय उत्पादों के लिए डिजिटल बाज़ार नई संभावनाओं के दरवाज़े खोल रहा है।

'आर्टिजन 2.0' के तहत आयोजित यह दो दिवसीय कार्यशाला इसी सोच को मज़बूत करती है कि कौशल विकास, डिजिटल शिक्षा और आधुनिक बाज़ारों से जुड़ाव ही आत्मनिर्भर और विकसित कश्मीर की बुनियाद है। जिस तरह घाटी के छात्र और दस्तकार नई तकनीक को अपनाकर आगे बढ़ रहे हैं, उससे यह साफ़ पैग़ाम मिलता है कि जम्मू-कश्मीर अमन, तरक़्क़ी और नए अवसरों की राह पर लगातार आगे बढ़ रहा है। डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और स्थानीय प्रतिभाओं को वैश्विक बाज़ारों से जोड़ने जैसी पहलें एक विकसित, आत्मविश्वासी और प्रगतिशील कश्मीर की तस्वीर को और मज़बूत कर रही हैं।

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