PoK में सियासी बातचीत नाकाम, पाकिस्तान की लूट और इस्तेहसाल के खिलाफ अवाम का गुस्सा भड़का


मुज़फ्फराबाद: पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में अवामी बेचेनी और एहतेजाजात का सिलसिला लगातार तेज़ होता जा रहा है। 31 मई 2026 को मुज़फ्फराबाद में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी, पाकिस्तानी वफाकी वुज़रा और तथाकथित आज़ाद जम्मू-कश्मीर हुकूमत के दरमियान करीब 10 घंटे तक चली अहम बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। बातचीत के पूरी तरह नाकाम हो जाने के बाद इलाके में पाकिस्तान के खिलाफ नाराज़गी और ज्यादा बढ़ गई है।

अवामी एक्शन कमेटी ने बातचीत के दौरान कई बुनियादी मुतालिबात पेश किए थे। इनमें बिजली की दरों में कमी, गेहूं पर सब्सिडी की बहाली, पाकिस्तान से बसाए गए लोगों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करना और हुकूमती व सियासी अशराफिया को मिलने वाली खास सहूलियतों का खात्मा शामिल था। लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान की तरफ से इन अहम मुद्दों पर कोई ठोस यकीनदिहानी नहीं दी गई, जिसके बाद बातचीत बेनतीजा खत्म हो गई।

बातचीत की नाकामी के बाद अवामी तंजीमों ने 9 जून को बड़े पैमाने पर “लॉन्ग मार्च” का ऐलान किया है। इलाके में जगह-जगह लोगों ने एहतेजाजी जलसे और रैलियां आयोजित कर पाकिस्तान की पॉलिसियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। मुज़फ्फराबाद, मीरपुर, कोटली और दूसरे इलाकों में लोगों ने बढ़ती महंगाई, बिजली संकट और मआशी बदहाली के खिलाफ नारेबाज़ी की।

मुहल्लिलीन का कहना है कि यह सूरत-ए-हाल पाकिस्तान के उस दावे को कमजोर करती है जिसमें वह PoJK को “आजाद” और “खुशहाल” इलाका बताने की कोशिश करता है। अवामी हलकों में यह एहसास तेजी से बढ़ रहा है कि इलाके के वसाइल का इस्तेमाल स्थानीय आबादी की भलाई के बजाय बाहरी मफादात के लिए किया जा रहा है। बिजली पैदा करने वाले कई बड़े प्रोजेक्ट मौजूद होने के बावजूद स्थानीय लोगों को महंगी बिजली का सामना करना पड़ रहा है, जबकि मुनाफा दूसरे इलाकों को पहुंच रहा है।

एहतेजाज करने वाले लोगों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे अरसे से इलाके के कुदरती वसाइल से फायदा उठाता रहा है लेकिन बदले में स्थानीय आबादी को बुनियादी सहूलियतें भी मयस्सर नहीं हैं। बेरोजगारी, महंगाई और तरक्कियाती कामों की कमी ने नौजवानों में मायूसी को बढ़ा दिया है। यही वजह है कि हालिया महीनों में पाकिस्तान विरोधी जज़्बात खुलकर सामने आने लगे हैं।

सियासी नज़रीन के मुताबिक 12 आरक्षित सीटों का मसला भी अवाम की नाराज़गी का बड़ा कारण है। मुंतक़िदीन का कहना है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद इलाके की सियासत पर अपना असर कायम रखना चाहता है। अवामी तंजीमें इसे स्थानीय लोगों के हकों और सियासी नुमाइंदगी पर हमला करार देती हैं। बातचीत के दौरान इस मुद्दे पर भी कोई सहमति न बन पाना लोगों के गुस्से को और बढ़ाने वाला साबित हुआ।

दूसरी तरफ, हुकूमती ओहदेदारों और सियासी तबके को मिलने वाली खास रियायतों पर भी सवाल उठ रहे हैं। आम लोगों का कहना है कि जब अवाम महंगाई और मआशी मुश्किलात का सामना कर रही है, तब हुकूमती तबके को मिलने वाली सहूलियतें नाइंसाफी की मिसाल हैं। यही वजह है कि इन रियायतों को खत्म करने की मांग भी आंदोलन का अहम हिस्सा बन चुकी है।

मुहल्लिलीन का मानना है कि हालिया घटनाक्रम पाकिस्तान की प्रशासनिक और सियासी पॉलिसियों के खिलाफ बढ़ते अवामी अविश्वास को उजागर करता है। बातचीत की नाकामी ने यह संदेश दिया है कि अवाम और हुकूमत के दरमियान फासला लगातार बढ़ रहा है। अगर लोगों की मआशी और सियासी शिकायतों का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शन और ज्यादा व्यापक हो सकते हैं।

9 जून को प्रस्तावित लॉन्ग मार्च को लेकर इलाके में तैयारियां तेज़ हैं। अवामी तंजीमें दावा कर रही हैं कि इसमें बड़ी तादाद में लोग शामिल होंगे और अपने बुनियादी हकों के लिए आवाज़ उठाएंगे। सोशल मीडिया पर भी पाकिस्तान की पॉलिसियों के खिलाफ बहस तेज़ हो गई है, जहां कई लोग इलाके की मौजूदा हालत पर सवाल उठा रहे हैं।

मुज़फ्फराबाद में हुई लंबी बातचीत का बेनतीजा खत्म होना PoJK में बढ़ती अवामी बेचैनी की एक अहम निशानी माना जा रहा है। बिजली, गेहूं सब्सिडी, सियासी नुमाइंदगी और मआशी इंसाफ जैसे मुद्दों पर कोई प्रगति न होना यह दिखाता है कि स्थानीय आबादी की शिकायतें अब भी बरकरार हैं। बढ़ते एहतेजाजात और घोषित लॉन्ग मार्च इस बात का संकेत हैं कि इलाके में अवाम और इस्लामाबाद के दरमियान तनाव कम होने के बजाय और गहरा होता जा रहा है।

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