
मालूमात के मुताबिक, नए बजट का मकसद फेडरल राजस्व को बढ़ाकर 17.1 ट्रिलियन रुपये तक पहुंचाना है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए आम लोगों पर टैक्स का अतिरिक्त बोझ डालना मौजूदा आर्थिक संकट को और गहरा कर सकता है।
पाकिस्तानी टिप्पणीकार मुहम्मद मलिक ने प्रस्तावित बजट की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि मुल्क की अवाम पहले ही रिकॉर्ड महंगाई, बढ़ती बिजली दरों और रोज़मर्रा की वस्तुओं की ऊंची कीमतों से परेशान है। उनके मुताबिक, सरकार की आर्थिक नाकामियों और गलत नीतियों का खामियाजा एक बार फिर आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
माहिरीन का कहना है कि ईंधन की कीमतों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। इसके चलते ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थों, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। ऐसे में नए ईंधन लेवी और टैक्स आम परिवारों के घरेलू बजट पर सीधा असर डाल सकते हैं।
आलोचकों का आरोप है कि पाकिस्तान में लंबे समय से आर्थिक फैसले ऐसी नीतियों के तहत लिए जा रहे हैं जिनका बोझ आम अवाम पर पड़ता है, जबकि सत्ता के गलियारों में बैठे प्रभावशाली तबकों पर अपेक्षाकृत कम असर दिखाई देता है। उनका कहना है कि मौजूदा हालात में जनता को राहत देने के बजाय नए टैक्स लगाना आर्थिक दबाव को और बढ़ाने वाला कदम साबित हो सकता है।
कई आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार बढ़ती महंगाई और नए करों के कारण निम्न और मध्यम आय वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। पहले से ही आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने लाखों परिवारों की क्रय शक्ति को कम कर दिया है। ऐसे में नए वित्तीय उपायों से लोगों की मुश्किलें और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अवाम के बीच भी इस प्रस्तावित बजट को लेकर बेचैनी देखी जा रही है। सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर लोग बढ़ती महंगाई, घटती आमदनी और जीवन-यापन की बढ़ती लागत को लेकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि आर्थिक सुधारों के नाम पर बार-बार आम नागरिकों से ही कुर्बानी मांगी जाती है।
अगर प्रस्तावित बजट मौजूदा स्वरूप में लागू होता है, तो पाकिस्तान में महंगाई के दबाव के और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। इससे पहले भी ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में कीमतों में बढ़ोतरी का असर पूरे बाजार पर देखा जा चुका है।
फिलहाल सभी निगाहें 5 जून को पेश होने वाले बजट पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि हुकूमत आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए कौन से कदम उठाती है और क्या आम लोगों को किसी प्रकार की राहत भी प्रदान की जाती है। लेकिन मौजूदा संकेत यही बताते हैं कि पाकिस्तान की अवाम को आने वाले दिनों में और अधिक आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

0 टिप्पणियाँ