पीओजेके में विरोध की आवाज़ कुचलने की साज़िश, पाक फौज ने LeT आतंकियों को बनाया हथियार


पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में अवामी एक्शन कमेटी (AAC) की जानिब से जारी अमनपसंद एहतिजाज के बीच पाक फौज और आईएसआई की एक और खतरनाक चाल सामने आई है। स्थानीय ज़राए और मुख़्तलिफ़ रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तानी हुकूमत और उसके सुरक्षा इदारे अब इन विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के आतंकियों का सहारा ले रहे हैं।

मालूमात के मुताबिक, लश्कर-ए-तैयबा के कई कमांडर और कैडर पीओजेके के मुख़्तलिफ़ इलाकों में सक्रिय किए गए हैं। इनका मक़सद अवामी एक्शन कमेटी के शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करना और दुनिया के सामने यह तसव्वुर पेश करना है कि प्रदर्शनकारी किसी उग्र या हिंसक तंजीम का हिस्सा हैं। हैरत की बात यह है कि जिस संगठन को दुनिया भर में एक आतंकवादी संगठन के तौर पर जाना जाता है, वही संगठन अब आम नागरिकों के आंदोलन को “दहशतगर्दी” बताने की मुहिम चला रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई हथियारबंद अफराद खुलेआम सड़कों और बाज़ारों में घूमते देखे गए हैं। इनमें से कई लोग खुद को अवामी एक्शन कमेटी से जुड़ा बताने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उनका वास्तविक संबंध लश्कर-ए-तैयबा से बताया जा रहा है। इससे यह अंदेशा मज़बूत हो गया है कि पाक फौज और आईएसआई एक सोची-समझी रणनीति के तहत आंदोलन में घुसपैठ करवाकर हालात को हिंसक बनाना चाहते हैं।

सियासी तजज़ियाकारों का मानना है कि यह पाकिस्तान के पुराने “टेरर प्रॉक्सी प्लेबुक” का हिस्सा है, जिसके तहत पहले हालात बिगाड़े जाते हैं, फिर उसी बहाने फौजी कार्रवाई को जायज़ ठहराया जाता है। पीओजेके में भी कुछ ऐसा ही मंजर दिखाई दे रहा है। अवामी एक्शन कमेटी लंबे अरसे से महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट, संसाधनों की लूट और बुनियादी हुकूक़ से महरूमी जैसे मुद्दों पर आवाज़ उठा रही है। लेकिन इन जायज़ मुतालिबात को सुनने के बजाय पाकिस्तान अब दमन और डराने-धमकाने की नीति पर उतर आया है।

मकामी हलकों में यह भी चर्चा है कि आतंकियों की मौजूदगी का इस्तेमाल किसी बड़े टकराव या हिंसक घटना के लिए किया जा सकता है, ताकि उसके बाद प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई की जा सके। लोगों को ख़ौफ़ है कि निर्दोष नागरिकों की जान को खतरा पैदा किया जा रहा है और फिर उसका इल्ज़ाम आंदोलनकारियों पर मढ़ने की तैयारी की जा रही है।

हक़ीक़त यह है कि अवामी एक्शन कमेटी का आंदोलन अब तक बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण रहा है। हजारों लोग अपने सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें दबाने के लिए प्रतिबंधित आतंकवादी तत्वों का इस्तेमाल किए जाने के आरोप पाकिस्तान की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई का दावा करता है, लेकिन पीओजेके में वही राज्य संस्थाएं एक प्रतिबंधित संगठन को अपने ही कब्जे वाले इलाकों के नागरिकों के खिलाफ़ इस्तेमाल करती दिखाई दे रही हैं। यह दोहरा रवैया पाकिस्तान की आतंकवाद संबंधी नीति की पोल खोलता है।

मकामी आबादी का कहना है कि अगर पाक फौज और आईएसआई वास्तव में अमन चाहती हैं, तो उन्हें लोगों की आवाज़ सुननी चाहिए, न कि आतंकवादी संगठनों को आगे करके अपने ही लोगों के खिलाफ़ मोर्चा खोलना चाहिए। पीओजेके के बाशिंदे आज यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर उनके जायज़ हुकूक़ मांगने पर उन्हें आतंकियों और बंदूकों का सामना क्यों करना पड़ रहा है।

पीओजेके में मौजूदा हालात ने एक बार फिर यह बहस तेज़ कर दी है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले इलाकों में लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबाने के लिए किस हद तक जा सकता है। अवामी एक्शन कमेटी के एहतिजाज को कुचलने के लिए लश्कर-ए-तैयबा जैसे प्रतिबंधित संगठन का कथित इस्तेमाल न सिर्फ़ इंसानी हुकूक़ के लिए खतरा है, बल्कि यह भी दिखाता है कि पाकिस्तान अपने ही लोगों के खिलाफ़ आतंकवादी प्रॉक्सी का सहारा लेने से भी गुरेज़ नहीं करता।

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