ब्रूस रीडेल के इस बयान ने पाकिस्तान के अंदर और बाहर नई बहस छेड़ दी है। सियासी जानकारों का कहना है कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब पाक फौज की वफादारी और उसकी नीतियों पर सवाल उठे हों। अतीत में भी कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और संस्थाएं पाकिस्तान की फौजी व्यवस्था पर आलोचना कर चुकी हैं। हालांकि इस बार एक प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्लेषक द्वारा किया गया यह खुलासा खासा चर्चा का विषय बन गया है।
माहिरीन का मानना है कि पाकिस्तान की फौज ने लंबे समय से मुल्क की सियासत, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पर गहरी पकड़ बनाए रखी है। आलोचकों का आरोप है कि फौज ने अपने संस्थागत हितों को हमेशा आम अवाम के हितों पर तरजीह दी है। यही वजह है कि मुल्क में लोकतांत्रिक संस्थाएं अक्सर कमजोर दिखाई देती हैं और अवाम की आवाज़ को दबाने की कोशिशें होती रहती हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, ब्रूस रीडेल का बयान उन आरोपों को और मजबूती देता है जिनमें कहा जाता रहा है कि पाक फौज विदेशी मदद और आर्थिक लाभ के बदले विभिन्न वैश्विक ताकतों के साथ अपने रिश्तों को ढालती रही है। इसके बावजूद जब आम लोग अपने हक़ूक़, बेहतर ज़िंदगी, रोज़गार, बिजली, पानी या बुनियादी सुविधाओं की मांग करते हैं, तो उन्हें देशद्रोही या राष्ट्र-विरोधी तत्व बताकर खामोश कराने की कोशिश की जाती है।
खास तौर पर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में हाल के महीनों के दौरान बढ़ते जनआंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों ने वहां की स्थिति को दुनिया के सामने उजागर किया है। स्थानीय लोग महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट और बुनियादी सुविधाओं की कमी के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं। मगर विभिन्न रिपोर्टों और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, इन प्रदर्शनों के जवाब में प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा सख्ती बरती गई है।
सियासी पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि किसी संस्था की वफादारी वास्तव में अपने मुल्क और अवाम के साथ हो, तो वह जनता की जायज़ मांगों को सुनने और उनका हल निकालने की कोशिश करेगी। लेकिन आलोचकों के अनुसार पाकिस्तान में अक्सर इसका उल्टा देखने को मिलता है, जहां विरोध की आवाज़ों को दबाने और असहमति जताने वालों को निशाना बनाने के आरोप लगते रहे हैं।
ब्रूस रीडेल के इस बयान को पाकिस्तान की फौजी नीतियों पर एक और बड़ा सवाल माना जा रहा है। कई जानकारों का कहना है कि यह खुलासा उस धारणा को बल देता है कि पाक फौज अपनी अवाम की बेहतरी से ज्यादा अपने संस्थागत और बाहरी हितों को अहमियत देती रही है। ऐसे में पाकिस्तान के भीतर लोकतंत्र, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों को लेकर बहस और तेज़ होने की संभावना है।
माहिरीन का मानना है कि जब तक अवाम की आवाज़ को इज़्ज़त नहीं दी जाती और जनता के बुनियादी हक़ूक़ को प्राथमिकता नहीं मिलती, तब तक पाकिस्तान के भीतर असंतोष और बेचेनी का माहौल कायम रह सकता है। ब्रूस रीडेल का ताज़ा बयान इसी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करता है और पाक फौज की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
0 टिप्पणियाँ