पाक फौज: पाकिस्तान को लूटने के बाद अब पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान के संसाधनों पर नज़र


पाकिस्तान की फौज खुद को अक्सर “गरीब फौज” बताने की कोशिश करती है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। पाकिस्तान के अंदर और बाहर कई रिपोर्टों तथा विश्लेषणों में यह सवाल लगातार उठता रहा है कि आखिर कैसे कुछ सैन्य अधिकारी और रिटायर्ड जनरल्स अरबों की दौलत के मालिक बन गए। अब इल्ज़ाम लगाया जा रहा है कि यही ताकतवर सैन्य नेटवर्क पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) और गिलगित-बाल्टिस्तान के कुदरती संसाधनों पर अपना कब्ज़ा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

माहिरीन का कहना है कि पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान खनिज संपदा, पानी, पर्यटन और जलविद्युत क्षमता के लिहाज़ से बेहद अहम इलाके हैं। लेकिन स्थानीय अवाम का आरोप है कि इन इलाकों के संसाधनों से होने वाला असल फायदा आम लोगों तक नहीं पहुंचता। इसके बरअक्स, फैसले लेने वाली ताकतें और उनसे जुड़े कारोबारी नेटवर्क सबसे ज्यादा लाभ हासिल करते हैं।

मुताल्लिक हलकों में यह बहस भी तेज़ है कि पाकिस्तान की फौज सिर्फ एक सैन्य संस्था नहीं रह गई, बल्कि उसने कारोबार, रियल एस्टेट, निर्माण, कृषि और कई अन्य क्षेत्रों में व्यापक आर्थिक प्रभाव कायम कर लिया है। आलोचकों का दावा है कि इस आर्थिक साम्राज्य ने फौज के कुछ उच्च अधिकारियों को असाधारण वित्तीय ताकत प्रदान की है, जबकि आम नागरिक महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान में संसाधनों के इस्तेमाल से जुड़े बड़े फैसले अक्सर स्थानीय आबादी की राय के बिना लिए जाते हैं। उनका आरोप है कि इलाके के लोगों को विकास और रोज़गार के बड़े वादे तो किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर संसाधनों से मिलने वाले फायदे सीमित ही रहते हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक, जलविद्युत परियोजनाओं, खनन गतिविधियों और भूमि अधिग्रहण से जुड़े कई मुद्दों पर स्थानीय समुदायों ने समय-समय पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो तेज़ी से हो रहा है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रोज़गार के क्षेत्र में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता।

अवाम के एक हिस्से का यह भी आरोप है कि जब लोग अपने अधिकारों, संसाधनों या स्थानीय हितों की बात करते हैं तो उनकी आवाज़ को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। कई स्थानीय संगठनों ने अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के अधिकार की मांग उठाई है।

माहिरीन का मानना है कि किसी भी क्षेत्र के संसाधनों का वास्तविक विकास तभी संभव है जब वहां के लोगों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए और संसाधनों से होने वाले लाभ का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित किया जाए। लेकिन आलोचकों का कहना है कि पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान में यह संतुलन अभी भी दिखाई नहीं देता।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधन वहां के लोगों की बेहतरी के लिए हैं, तो फिर स्थानीय आबादी को उसका अपेक्षित लाभ क्यों नहीं मिल रहा। यही सवाल आज पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान में बढ़ती बहस का केंद्र बना हुआ है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के भीतर आर्थिक संकट गहराने के साथ-साथ संसाधन संपन्न इलाकों का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि इन क्षेत्रों के संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। दूसरी तरफ स्थानीय समुदाय अधिक अधिकार, अधिक पारदर्शिता और अपने प्राकृतिक संसाधनों में हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं।

निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या स्थानीय लोगों की आवाज़ को सुना जाएगा या फिर संसाधनों के दोहन और नियंत्रण को लेकर विवाद आगे भी जारी रहेगा। पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग लंबे समय से यह सवाल उठा रहे हैं कि उनकी जमीन, उनके पानी और उनके संसाधनों से पैदा होने वाली दौलत का असली हकदार कौन है।

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