
इस बातचीत में अवाम की तरफ़ से कुछ बुनियादी और जायज़ मुतालिबात पेश किए गए थे। इनमें सस्ती बिजली की फ़राहमी, गेहूं पर सब्सिडी की बहाली, पाकिस्तान से आए बसाए गए लोगों के लिए आरक्षित 12 सीटों को ख़त्म करना और हुकूमती व सियासी अभिजात वर्ग को मिलने वाली विशेष सुविधाओं को समाप्त करना शामिल था। मगर हैरत की बात यह रही कि इन तमाम मांगों को या तो नज़रअंदाज़ किया गया या फिर साफ़ तौर पर ठुकरा दिया गया।
बातचीत के नाकाम होने के बाद इलाके में ग़ुस्से और मायूसी का माहौल और ज़्यादा गहरा हो गया है। अवामी एक्शन कमेटी ने 9 जून को एक बड़े "लॉन्ग मार्च" का एलान किया है, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि लोगों का सब्र जवाब दे चुका है। सड़कों पर निकलती भीड़, पाकिस्तान विरोधी नारे और बढ़ते एहतिजाज इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पीओजेके की अवाम अब अपने साथ हो रहे आर्थिक और सियासी शोषण के ख़िलाफ़ खुलकर आवाज़ बुलंद कर रही है।
इलाके के लोगों का कहना है कि उनके प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल पाकिस्तान के फायदे के लिए किया जा रहा है, जबकि स्थानीय आबादी को बिजली, रोज़गार, महंगाई और खाद्य संकट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जलविद्युत परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों को दिया जाता है, जबकि स्थानीय लोग महंगी बिजली खरीदने को मजबूर हैं। इसी तरह गेहूं और अन्य ज़रूरी वस्तुओं पर मिलने वाली राहत में कटौती ने आम आदमी की ज़िंदगी को और मुश्किल बना दिया है।
सियासी स्तर पर भी लोगों में नाराज़गी बढ़ रही है। पाकिस्तान द्वारा आरक्षित सीटों और प्रशासनिक हस्तक्षेप को स्थानीय लोग अपनी राजनीतिक पहचान और अधिकारों पर हमला मानते हैं। उनका आरोप है कि इस व्यवस्था के ज़रिए इस्लामाबाद स्थानीय फैसलों पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है और जनता की असली आवाज़ को दबाया जा रहा है।
इन हालात ने पाकिस्तान के उस दावे को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है जिसमें वह पीओजेके को "भाईचारे" और "खुशहाली" की मिसाल बताता रहा है। ज़मीनी हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट नज़र आती है, जहां लोग आर्थिक तंगी, राजनीतिक उपेक्षा और प्रशासनिक भेदभाव से परेशान हैं। हालिया विरोध प्रदर्शनों और नाकाम बातचीत ने इस बढ़ते असंतोष को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है।
आज पीओजेके में जो आवाज़ें बुलंद हो रही हैं, वे केवल महंगाई या बिजली के बिलों के खिलाफ़ नहीं हैं, बल्कि वे सम्मान, अधिकार और न्याय की मांग का प्रतीक बन चुकी हैं। मुज़फ़्फ़राबाद से लेकर दूसरे इलाकों तक फैलता जनाक्रोश यह संकेत दे रहा है कि अवाम अब अपने संसाधनों की लूट, राजनीतिक नियंत्रण और आर्थिक शोषण के खिलाफ़ खड़ी हो रही है।

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