अवाम परेशान, हुक्मरान मशगूल: अमेरिका में लॉबिंग पर पाकिस्तान का बड़ा खर्च


एक ताज़ा रिपोर्ट ने पाकिस्तान की मआशी हालत और उसकी हुकूमती तरजीहात पर संगीन सवालात खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान हर महीने तक़रीबन 9 लाख अमेरिकी डॉलर अमेरिका में लॉबिंग पर खर्च कर रहा है, जबकि मुल्क इस वक्त भारी कर्ज़, बढ़ती महंगाई, विदेशी मुद्रा की कमी और आईएमएफ के बेलआउट पैकेजों पर लगातार बढ़ती निर्भरता से जूझ रहा है।

मालूमात के मुताबिक, पाकिस्तान की इकॉनमी पिछले कई बरसों से गंभीर दबाव में है। आम अवाम रोज़मर्रा की ज़रूरतों की चीज़ों की आसमान छूती कीमतों से परेशान है, जबकि बिजली, ईंधन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती लागत ने लोगों की मुश्किलात में और इज़ाफ़ा कर दिया है। ऐसे हालात में अमेरिका में लॉबिंग पर लाखों डॉलर का खर्च नई बहस को जन्म दे रहा है।

सियासी और मआशी हलकों में इस बात पर तन्क़ीद की जा रही है कि जब मुल्क को अपने कर्ज़ चुकाने के लिए बार-बार आईएमएफ के दरवाज़े पर दस्तक देनी पड़ रही है, तब हुकूमत का इतना बड़ा पैसा विदेशी लॉबिंग पर खर्च करना किस हद तक जायज़ है। नाक़िदीन का कहना है कि यह रकम मुल्क के अंदर रोज़गार, तालीम, सेहत और बुनियादी ढांचे की बेहतरी पर खर्च की जा सकती थी।

माहिरीन का मानना है कि अमेरिका में लॉबिंग का मक़सद वॉशिंगटन में पाकिस्तान के लिए सियासी और सफ़ारती हमदर्दी हासिल करना हो सकता है, लेकिन मौजूदा मआशी हालात में इस तरह के खर्च को अवाम आसानी से कबूल नहीं कर पा रही है। उनका कहना है कि जब आम आदमी महंगाई के बोझ तले दबा हुआ हो, तब सरकारी खर्चों में एहतियात और जवाबदेही सबसे ज़्यादा ज़रूरी होती है।

रिपोर्ट के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज़ हो गई है। कई लोगों ने सवाल उठाया है कि एक तरफ पाकिस्तान आईएमएफ से राहत पैकेज हासिल करने के लिए कोशिशें कर रहा है, जबकि दूसरी तरफ वही मुल्क विदेशों में अपनी छवि सुधारने और असर-ओ-रसूख बढ़ाने के लिए बड़ी रकम खर्च कर रहा है। अवाम के एक तबके का कहना है कि हुक्मरानों को सबसे पहले घरेलू मआशी चुनौतियों पर तवज्जो देनी चाहिए।

तजज़ियाकारों के मुताबिक पाकिस्तान की मौजूदा कहानी अब सिर्फ कर्ज़ तक महदूद नहीं रही, बल्कि यह “ड्रग्स से डेट डिप्लोमेसी तक” की एक लंबी दास्तान बनती जा रही है, जहां मुल्क अपनी मआशी कमज़ोरियों को दूर करने के बजाय बाहरी सहारे और विदेशी लॉबिंग पर ज़्यादा भरोसा करता दिखाई देता है। उनका कहना है कि जब तक इकॉनमी की बुनियादी कमज़ोरियों को दूर नहीं किया जाता, तब तक किसी भी तरह की लॉबिंग या सफ़ारती कोशिशें स्थायी नतीजे नहीं दे सकतीं।

माहिरीन का यह भी कहना है कि पाकिस्तान को अपनी मआशी पालिसियों में इस्लाह लानी होगी, टैक्स बेस बढ़ाना होगा, गैर-ज़रूरी सरकारी खर्चों में कटौती करनी होगी और निवेश को बढ़ावा देना होगा। इसके बिना कर्ज़ और बेलआउट पैकेजों का सिलसिला जारी रह सकता है।

फिलहाल यह मामला पाकिस्तान की मआशी हालत और हुकूमती तरजीहात के बीच बढ़ते फ़ासले को उजागर करता है। एक तरफ मुल्क आईएमएफ से मदद का तलबगार है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका में लाखों डॉलर की लॉबिंग पर खर्च यह सवाल पैदा कर रहा है कि आखिर पाकिस्तान की असली तरजीह अवाम की भलाई है या वॉशिंगटन के गलियारों में असर-ओ-रसूख बढ़ाना।

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