मुकामी अवाम का कहना है कि उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि वे अपने हक की बात कर रहे थे। लेकिन जवाब में उन्हें गोलियां मिलीं। और यह कोई पहला मौका नहीं है। पीओजेके के लोग बरसों से शिकायत करते आए हैं कि इस इलाके के संसाधनों पर उनका हक नहीं है और हर बड़े फैसले पर इस्लामाबाद का नियंत्रण रहता है। जब भी लोग अपनी आवाज बुलंद करते हैं, उन्हें दबाने की कोशिश की जाती है।
रावलाकोट और आसपास के इलाकों में हालात उस वक्त और बिगड़ गए जब संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी यानी जेएएसी के बैनर तले हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। उनका कहना था कि इलाके में महंगाई आसमान छू रही है, बिजली के बिल गरीब लोगों की पहुंच से बाहर हो चुके हैं और गेहूं जैसी बुनियादी जरूरतों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसके अलावा लोग अपने राजनीतिक अधिकारों और प्रशासन में ज्यादा भागीदारी की भी मांग कर रहे थे।
लेकिन इन जायज मांगों का जवाब बातचीत से नहीं बल्कि ताकत के इस्तेमाल से दिया गया। चश्मदीदों के मुताबिक सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पहले बल प्रयोग किया और फिर कई जगहों पर गोलियां भी चलाई गईं। इससे इलाके में डर और गुस्से का माहौल बन गया है। लोग पूछ रहे हैं कि अगर अपने ही नागरिकों की बात सुनने के बजाय उन पर हथियार उठाए जाएं, तो इसे लोकतंत्र कैसे कहा जा सकता है।
इस बीच पीओजेके में इस महीने के आखिर में स्थानीय निकाय और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर चुनावी माहौल भी गर्म है। चुनावों की तैयारियों के बीच जिस तरह विरोध प्रदर्शनों को दबाया जा रहा है, उससे निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। विपक्षी समूहों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब लोगों को खुलकर अपनी बात कहने की आजादी नहीं होगी, तब चुनाव केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएंगे।
मुकामी नौजवानों में भी नाराजगी बढ़ रही है। उनका कहना है कि पीओजेके के लोगों को आज तक वह सम्मान और अधिकार नहीं मिले जिसके वादे सालों से किए जाते रहे हैं। विकास, रोजगार और बेहतर जीवन की उम्मीद में जी रही अवाम अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। कई लोग यह भी मानते हैं कि इस इलाके को सिर्फ रणनीतिक नजरिए से देखा जाता है, जबकि यहां रहने वाले लोगों की जरूरतों और आकांक्षाओं को नजरअंदाज किया जाता है।
वुछिव, हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि अपने हक की मांग करने वाले निहत्थे लोगों को भी दुश्मन समझा जा रहा है। अवाम का कहना है कि जो फौज अपने ही लोगों की आवाज दबाने के लिए बंदूक का सहारा ले, वह सुरक्षा की नहीं बल्कि खौफ की निशानी बन जाती है। यही वजह है कि पीओजेके में पाक फौज के खिलाफ गुस्सा लगातार बढ़ रहा है और लोग खुले तौर पर कहने लगे हैं कि उन्हें अधिकार चाहिए, गोलियां नहीं।
आज पीओजेके की सड़कों से उठ रही आवाज साफ है—अवाम इंसाफ, सम्मान और अपने बुनियादी अधिकार चाहती है। लेकिन जब जवाब में दमन और हिंसा मिले, तो यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है कि आखिर वहां लोकतंत्र कितना मजबूत है और जनता की आवाज की कितनी कीमत है।


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