बचपन की कीमत पर नहीं बन सकता कश्मीर का मुस्तक़बिल: विश्व बाल मज़दूरी निषेध दिवस पर कश्मीर के बच्चों के हुक़ूक़ की आवाज़

हर साल 12 जून को पूरी दुनिया बाल मज़दूरी के ख़िलाफ़ आलमी दिन (World Day Against Child Labour) मनाती है। इस दिन का मक़सद उन लाखों बच्चों के बारे में जागरूकता पैदा करना है जो अपने बचपन से महरूम होकर ऐसी उम्र में काम करने पर मजबूर हैं, जब उन्हें तालीम हासिल करनी चाहिए, खेलना चाहिए और अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए सीखना चाहिए। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हर बच्चे को तालीम, तहफ़्फ़ुज़ और ऐसे मौक़ों का हक़ हासिल है जो उसे अपनी पूरी सलाहियत तक पहुँचने में मदद दें। अगरचे दुनिया भर में बाल मज़दूरी को कम करने में काफ़ी पेशक़दमी हुई है, लेकिन यह मसला अब भी कई इलाक़ों में मौजूद है, जिनमें जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से भी शामिल हैं, जहाँ मआशी और समाजी हालात बच्चों को अक्सर नाज़ुक और मुश्किल हालात में धकेल देते हैं।

बाल मज़दूरी का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि बच्चे घर के मामूल के कामों में अपने वालिदैन की मदद करें। बाल मज़दूरी उस काम को कहा जाता है जो बच्चों को उनके बचपन से महरूम कर दे, उनकी तालीम में रुकावट पैदा करे और उनकी जिस्मानी, ज़ेहनी या जज़्बाती तरक़्क़ी पर मनफ़ी असर डाले। जब बच्चे स्कूल जाने के बजाय लंबे वक़्त तक रोज़ी-रोटी कमाने में लगे रहते हैं, तो वे उन अहम मौक़ों से महरूम हो जाते हैं जो उनके बेहतर मुस्तकबिल की बुनियाद बन सकते हैं।

कश्मीर अपनी अमीर तहज़ीबी विरासत, दिलकश फ़ितरी हुस्न और मज़बूत इरादों वाले लोगों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। मगर कई दूसरे तरक़्क़ी-पज़ीर इलाक़ों की तरह यहाँ भी कुछ मआशी और समाजी चुनौतियाँ मौजूद हैं, जो बाल मज़दूरी को बढ़ावा दे सकती हैं। माली परेशानियाँ, बेरोज़गारी और रोज़गार के सीमित मौक़े कभी-कभी परिवारों को आमदनी के अतिरिक्त ज़राए तलाश करने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसे हालात में बच्चे भी घर के खर्च में हाथ बँटाने के लिए काम करने पर मजबूर हो सकते हैं।

कुछ इलाक़ों में बच्चे सड़क किनारे दुकानों, वर्कशॉपों, होटलों, खेती-बाड़ी या छोटे पारिवारिक कारोबारों में मदद करते दिखाई देते हैं। अगरचे हर तरह का ऐसा काम बाल मज़दूरी के दायरे में नहीं आता, लेकिन फ़िक्र उस वक़्त पैदा होती है जब ये सरगर्मियाँ बच्चों को स्कूल जाने से रोक दें या उन्हें गैर-महफ़ूज़ और इस्तेहसाली माहौल का सामना करना पड़े। यह मसला अक्सर छुपा रहता है और कम रिपोर्ट किया जाता है, जिसकी वजह से इसकी असल सूरत-ए-हाल का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है।

तालीम ग़ुरबत के दायरे को तोड़ने और बाल मज़दूरी को रोकने का सबसे मज़बूत ज़रिया है। गुज़िश्ता कुछ बरसों में जम्मू-कश्मीर में तालीमी ढाँचे, साक्षरता मुहिमों और स्कूल दाख़िलों में काफ़ी बेहतरी देखने को मिली है। इसके बावजूद मआशी अस्थिरता, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ और कभी-कभार तालीमी निज़ाम में आने वाली रुकावटें बच्चों की लगातार तालीम पर असर डाल सकती हैं। जो बच्चा स्कूल छोड़ देता है, उसके कम उम्र में कामकाजी दुनिया में दाख़िल होने का ख़तरा बढ़ जाता है, जिससे उसके मुस्तकबिल के मौक़े सीमित हो जाते हैं।

बाल मज़दूरी के असरात सिर्फ़ एक बच्चे तक महदूद नहीं रहते। जब बच्चों को तालीम और हुनर सीखने के मौक़ों से महरूम किया जाता है, तो पूरा समाज अपने कीमती इंसानी सरमाये से वंचित हो जाता है। जो बच्चा सीखने के बजाय अपने शुरुआती साल मज़दूरी में गुज़ार देता है, उसके बड़े होकर स्थायी और बेहतर रोज़गार हासिल करने के इमकान कम हो जाते हैं। इससे ग़ुरबत का वह चक्र जारी रहता है जो नस्ल-दर-नस्ल चलता रहता है। कश्मीर जैसे इलाके के लिए, जहाँ नौजवानों की उम्मीदें और ख़्वाहिशें समाजी और मआशी तरक़्क़ी में अहम किरदार अदा करती हैं, बचपन की हिफाज़त दरअसल लंबे अरसे की तरक़्क़ी में एक अहम निवेश है।

बाल मज़दूरी बच्चों की जिस्मानी और ज़ेहनी सेहत पर भी संगीन असर डालती है। लंबे काम के घंटे, गैर-महफ़ूज़ माहौल और ज़रूरत से ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ बच्चों पर भारी दबाव डालती हैं। इससे उन्हें सेहत से जुड़े मसाइल, जज़्बाती तनाव और ख़ुद-एतमादी में कमी का सामना करना पड़ सकता है। सबसे अहम बात यह है कि वे बचपन की उन ख़ुशियों और तजरबों से महरूम हो जाते हैं जो एक सेहतमंद और खुशहाल ज़िंदगी की पहचान होते हैं। हर बच्चे को सपने देखने, अपनी सलाहियतें तलाश करने, दोस्तियाँ बनाने और बेहतर तालीम हासिल करने का पूरा मौक़ा मिलना चाहिए, बिना किसी बोझ या मजबूरी के।

बाल मज़दूरी के ख़ात्मे के लिए हुकूमती इदारों, स्कूलों, सिविल सोसाइटी तंज़ीमों, समाजी रहनुमाओं और परिवारों की मुश्तरका कोशिशें ज़रूरी हैं। बच्चों की तालीम को बढ़ावा देने और मआशी तौर पर कमज़ोर परिवारों की मदद के लिए मुख़्तलिफ़ वेलफ़ेयर स्कीमें, तालीमी प्रोग्राम और जागरूकता मुहिमें शुरू की गई हैं। लेकिन सिर्फ़ क़ानून और पालिसियाँ इस मसले को पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकतीं। समाजी जागरूकता और सामूहिक ज़िम्मेदारी भी उतनी ही अहम हैं ताकि ऐसे बच्चों की पहचान की जा सके जो जोखिम में हैं और उन्हें ज़रूरी मदद फ़राहम की जा सके।

वालिदैन और सरपरस्तों को यह समझाने की ज़रूरत है कि तालीम उनके बच्चों के मुस्तकबिल की सबसे कीमती सरमायाकारी है। स्कूलों को ऐसा माहौल पैदा करना चाहिए जहाँ हर बच्चा ख़ुद को महफ़ूज़, शामिल और प्रेरित महसूस करे। स्थानीय समुदाय भी बाल शोषण के मामलों की जानकारी देकर और बच्चों की भलाई व तालीम से जुड़ी मुहिमों का साथ देकर अहम किरदार निभा सकते हैं।

इस बाल मज़दूरी के ख़िलाफ़ आलमी दिन पर पैग़ाम बिल्कुल वाज़ेह है — किसी भी बच्चे को ज़िंदा रहने के लिए अपनी तालीम, सुरक्षा या ख़ुशियों की क़ुर्बानी नहीं देनी चाहिए। कश्मीर का मुस्तकबिल उसकी नौजवान नस्ल के हाथों में है और उनके हुक़ूक़ की हिफाज़त तथा उनकी सलाहियतों को निखारने के लिए हर मुमकिन कोशिश की जानी चाहिए। जब हम यह यक़ीनी बनाएँगे कि बच्चे काम की जगह स्कूलों और तालीमी इदारों में हों, तब हम एक मज़बूत, खुशहाल और हमदर्द समाज की तामीर कर सकेंगे।

बचपन ज़िंदगी का एक बेहद क़ीमती दौर है, जो इल्म, उम्मीद और बेहतरीन मौक़ों से भरपूर होना चाहिए, न कि मज़दूरी और मजबूरियों से। इसकी हिफाज़त करना सिर्फ़ हमारी अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी ही नहीं, बल्कि कश्मीर के रोशन मुस्तकबिल के साथ हमारा एक अहम अहद भी है।

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