
तजज़ियाकार के मुताबिक़, फ़ौज का ऊपरी निज़ाम एक ऐसी इदारा-साज़ी पर खड़ा है जहाँ ताक़त, कारोबार और असर-ओ-रसूख़ आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि जो भी शख़्स फ़ौज की आला क़ियादत तक पहुँचता है, वह इस पूरे निज़ाम का हिस्सा बन जाता है और ढाँचा वैसा ही बना रहता है, चाहे मुल्क में कोई भी हुकूमत क्यों न हो।
इन बयानों ने एक बार फिर उस बहस को ज़िंदा कर दिया है जिसमें बरसों से यह सवाल उठता रहा है कि क्या पाकिस्तान में असली ताक़त अवामी नुमाइंदों के पास है या फिर गैर-मुन्तख़ब इदारों के हाथों में। सियासी माहिरीन का मानना है कि किसी भी जम्हूरी मुल्क में फ़ौज का बुनियादी किरदार सरहदों की हिफ़ाज़त और क़ौमी सलामती को यक़ीनी बनाना होता है। लेकिन जब फ़ौजी इदारे कारोबारी और मआशी मामलों में बहुत ज़्यादा दख़ल देने लगें तो जम्हूरी इदारों की हैसियत कमज़ोर पड़ने का ख़तरा पैदा हो जाता है।
रिपोर्टों और आलोचनाओं में लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि पाकिस्तान में फ़ौज से जुड़े कई ट्रस्ट, हाउसिंग प्रोजेक्ट, इंडस्ट्रीज़ और कारोबारी इकाइयाँ बड़े पैमाने पर मआशी असर रखती हैं। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की आर्थिक पकड़ किसी भी इदारे को आम जवाबदेही से दूर ले जा सकती है। हालांकि फ़ौज और उसके हिमायती इन आरोपों को अक्सर मुल्की तरक़्क़ी और फ़लाही कामों से जोड़कर देखते हैं।
ताज़ा बयान की सबसे अहम बात यह है कि यह आलोचना किसी बाहरी स्रोत की बजाय एक पाकिस्तानी तजज़ियाकार की तरफ़ से सामने आई है। इसी वजह से सोशल मीडिया और सियासी हल्कों में इस पर ख़ास चर्चा हो रही है। कई लोगों का कहना है कि अगर ऐसे दावों में सच्चाई है तो पाकिस्तान को अपने इदारों के बीच ताक़त के तवाज़ुन पर गंभीर ग़ौर करने की ज़रूरत है।
माहिरीन के मुताबिक़, जम्हूरियत तभी मज़बूत होती है जब तमाम इदारे अपने दायरे में रहकर काम करें और आख़िरी इख़्तियार अवाम के चुने हुए नुमाइंदों के पास हो। अगर किसी मुल्क में फ़ौजी ताक़त सियासी और मआशी फ़ैसलों पर हावी हो जाए तो वहाँ जम्हूरी अमल कमज़ोर पड़ सकता है। पाकिस्तान की तारीख़ में कई ऐसे दौर गुज़रे हैं जब फ़ौजी हुकूमतें सीधे तौर पर सत्ता में रहीं या सियासी मंज़रनामे पर उनका गहरा असर रहा।
इधर पाकिस्तान की आम आवाम को दरपेश मआशी मुश्किलात भी इस बहस को और अहम बना देती हैं। बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी, कर्ज़ों का बोझ और बुनियादी सहूलियात की कमी जैसे मसाइल से लोग पहले ही परेशान हैं। ऐसे में जब फ़ौज के कारोबारी हितों और आर्थिक साम्राज्य को लेकर सवाल उठते हैं तो कई नागरिक यह जानना चाहते हैं कि मुल्क के संसाधनों का इस्तेमाल किस हद तक अवामी भलाई के लिए हो रहा है।
सियासी मुबास्सिरीन का कहना है कि किसी भी मुल्क की तरक़्क़ी के लिए मज़बूत जम्हूरी इदारे, शफ़्फ़ाफ़ जवाबदेही और क़ानून की हुक्मरानी बेहद ज़रूरी है। अगर ताक़त कुछ चुनिंदा हल्कों तक महदूद हो जाए तो अवामी एतिमाद को नुक़सान पहुँच सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान में फ़ौज के रोल पर होने वाली बहस सिर्फ़ एक इदारे तक सीमित नहीं बल्कि पूरे जम्हूरी ढाँचे से जुड़ा हुआ मामला बन चुकी है।
फ़िलहाल इन दावों और आरोपों पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। एक तरफ़ आलोचक इसे पाकिस्तान के अंदरूनी निज़ाम की हक़ीक़त का इज़हार बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ लोग इन बयानों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई ताबीर करार दे रहे हैं। मगर इतना ज़रूर है कि इस खुलासे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मुल्क की सबसे ताक़तवर संस्था को सिर्फ़ क़ौमी सुरक्षा तक महदूद रहना चाहिए या फिर उसका बढ़ता मआशी और सियासी असर जम्हूरियत के लिए चुनौती बन सकता है।
यह पूरा मामला इस बहस को मज़बूत करता है कि जब फ़ौजी ताक़त जम्हूरी इदारों पर हावी होने लगे, तो अवामी नुमाइंदगी, जवाबदेही और क़ानून की हुक्मरानी प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि पाकिस्तान में फ़ौज के किरदार पर उठने वाले सवाल सिर्फ़ सियासी नहीं बल्कि जम्हूरी मुस्तक़बिल से भी जुड़े हुए माने जा रहे हैं।

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