पाकिस्तान की आतंक फैक्ट्री : बेखौफ आतंक और सियासत का गठजोड़


पाकिस्तान एक बार फिर ऐसे विवाद के केंद्र में है जिसने उसके आतंकवाद से रिश्तों पर पुराने सवालों को और गहरा कर दिया है। हाल ही में सोशल मीडिया और कुछ सार्वजनिक मंचों पर ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जिनमें प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े माने जाने वाले हाफिज सईद को कथित तौर पर "पाकिस्तान के राष्ट्रपति" और उनके करीबी सहयोगी सैफुल्लाह कसूरी को "प्रधानमंत्री" के रूप में पेश किया गया है। इन तस्वीरों में पाकिस्तानी झंडों, बैनरों और एक आधिकारिक समारोह जैसी सजावट का इस्तेमाल किया गया है, जिसने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

जनाब, सवाल सिर्फ तस्वीरों का नहीं है, सवाल उस सोच का है जो आतंक और सियासत के बीच की लकीर को मिटाती हुई दिखाई देती है। अगर किसी ऐसे शख्स को, जिस पर लंबे समय से आतंकवाद से जुड़े आरोप लगते रहे हों, सार्वजनिक रूप से इस तरह पेश किया जाता है, तो दुनिया यह पूछने पर मजबूर हो जाती है कि आखिर पाकिस्तान किस दिशा में बढ़ रहा है।

मामला और भी गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि ये तस्वीरें ऐसे समय सामने आई हैं जब पाकिस्तान बार-बार दुनिया के सामने आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने का दावा करता है। मगर दूसरी तरफ, आलोचकों का कहना है कि देश के भीतर कुछ कट्टरपंथी और आतंकी विचारधारा से जुड़े समूह अब भी राजनीतिक और सामाजिक स्पेस में सक्रिय दिखाई देते हैं। यही वजह है कि पाकिस्तान की नीतियों पर अक्सर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।

दरअसल, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल भाषणों और बयानों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए साफ नीयत और सख्त कार्रवाई की जरूरत होती है। लेकिन जब कथित तौर पर प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े चेहरे सार्वजनिक मंचों पर नजर आएं, राजनीतिक प्रतीकों का इस्तेमाल करें और उन्हें खुलकर समर्थन मिलता हुआ दिखाई दे, तो यह संदेश जाता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई सिर्फ दिखावे तक सीमित है।

आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान में कुछ ऐसे संगठन हैं जो नाम बदलकर या नए राजनीतिक मंच बनाकर अपनी गतिविधियां जारी रखते हैं। यही वजह है कि समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि क्या आतंकवाद और राजनीति के बीच कोई ऐसा गठजोड़ मौजूद है जिसे खत्म करने की वास्तविक कोशिश नहीं की जा रही।

जनाब, दुनिया बदल चुकी है। आज हर तस्वीर, हर वीडियो और हर बयान वैश्विक स्तर पर जांचा-परखा जाता है। ऐसे में यदि आतंकवाद से जुड़े विवादित चेहरों को किसी भी रूप में सम्मान या राजनीतिक पहचान मिलती हुई दिखाई दे, तो इसका असर केवल पाकिस्तान की छवि पर नहीं पड़ता बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता पर भी सवाल उठते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पाकिस्तान दुनिया को क्या संदेश देना चाहता है? एक ऐसा देश जो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का दावा करता है, या फिर ऐसा मुल्क जहां कट्टरपंथी और विवादित तत्व अब भी प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं?

ये तस्वीरें चाहे प्रतीकात्मक हों या राजनीतिक संदेश देने की कोशिश, मगर उन्होंने एक बार फिर उस बहस को जिंदा कर दिया है जिसे पाकिस्तान वर्षों से पीछे छोड़ने की कोशिश करता रहा है। और यही वजह है कि आलोचक इसे "पाकिस्तान की आतंक फैक्ट्री" का एक और चेहरा बता रहे हैं—एक ऐसा चेहरा जो कथित तौर पर आतंक और सियासत के बीच की दूरी को खत्म करता हुआ दिखाई देता है।

आखिर में सवाल वही है—क्या पाकिस्तान वाकई आतंकवाद के खिलाफ है, या फिर आतंक के साए में सियासत अब भी बेखौफ जारी है? दुनिया इस सवाल का जवाब तलाश रही है और आने वाले दिनों में पाकिस्तान को भी इसका जवाब देना होगा।

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