प्रतिबंधित संगठन जेएएसी के समर्थन में शुरू हुए प्रदर्शनों ने देखते ही देखते बड़े आंदोलन का रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि उन्हें राजनीतिक अधिकार दिए जाएं, रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की कीमतें कम की जाएं और विधानसभा में आरक्षित सीटों की व्यवस्था को खत्म किया जाए। मगर पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने इन मांगों को सुनने के बजाय आंदोलन को कुचलने की कोशिश की।
मुज़फ्फराबाद के नीलम ब्रिज और दूसरे इलाकों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। इन घटनाओं में कम से कम 11 से 15 लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं, जबकि कई लोग ज़ख्मी हुए हैं। पूरे इलाके में हड़ताल और बंद का माहौल है। बाज़ार सूने पड़े हैं और लोगों के दिलों में डर और गुस्सा दोनों साफ़ दिखाई दे रहे हैं।
ये कोई पहली बार नहीं है जब पीओजेके की अवाम को अपने ही हक़ के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा हो। बरसों से वहां के लोग महंगाई, बेरोज़गारी और राजनीतिक भेदभाव का सामना कर रहे हैं। लेकिन जब भी उन्होंने अपनी आवाज़ बुलंद करने की कोशिश की, पाकिस्तान की हुकूमत ने उसे दबाने का काम किया। ऐसा लगता है कि इस इलाके में लोकतंत्र सिर्फ किताबों की बात है, ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही है।
इसी महीने के आखिर में पीओजेके में चुनावी कार्यक्रम की घोषणा होने की उम्मीद है। मगर बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे माहौल में निष्पक्ष और आज़ाद चुनाव मुमकिन हैं? जब लोगों को अपनी राय रखने की आज़ादी नहीं, जब विरोध करने वालों को गोलियों से जवाब दिया जाता हो, तब चुनाव सिर्फ एक रस्म बनकर रह जाते हैं। अवाम का एक बड़ा तबका मानता है कि पाकिस्तान यहां लोकतंत्र का दिखावा करता है, जबकि असल सत्ता फौज और सुरक्षा एजेंसियों के हाथों में है।
कश्मीरी अवाम की यह शिकायत नई नहीं है कि उनके राजनीतिक भविष्य का फैसला इस्लामाबाद में बैठी हुकूमत और पाकिस्तानी फौज करती है। स्थानीय नेताओं को सीमित दायरे में रखा जाता है और जो कोई भी अलग राय रखता है, उसे देशद्रोही या बाग़ी करार देने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि आज पीओजेके के कई हिस्सों में लोगों का भरोसा सरकारी संस्थाओं से उठता जा रहा है।
पाकिस्तान खुद को दुनिया के सामने लोकतांत्रिक मुल्क बताने की कोशिश करता है, लेकिन पीओजेके की सड़कों पर बहता खून एक अलग कहानी बयान करता है। यहां अवाम सस्ती बिजली, सस्ता आटा और राजनीतिक हक़ की मांग करती है, मगर जवाब में उन्हें डर, धमकी और गोलियां मिलती हैं। यह रवैया साफ़ दिखाता है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले इस इलाके को एक लोकतांत्रिक इकाई नहीं, बल्कि एक नियंत्रित क्षेत्र की तरह चलाना चाहता है।
आज पीओजेके की सरज़मीं से उठ रही आवाज़ सिर्फ आर्थिक परेशानियों की नहीं है, बल्कि इज़्ज़त, इंसाफ़ और आज़ादी से जीने के हक़ की आवाज़ है। जब तक इन मांगों को ईमानदारी से नहीं सुना जाएगा, तब तक वहां अमन और स्थिरता कायम होना मुश्किल है। अवाम के जज़्बात को गोलियों से दबाया जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए ख़ामोश नहीं किया जा सकता। पीओजेके की फिज़ाओं में उठ रही यह पुकार अब पहले से कहीं ज़्यादा बुलंद हो चुकी है।


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