ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में अपनी तकरीर के दौरान बॉब ब्लैकमैन ने कहा कि पाकिस्तान ने 1947 से जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर गैर-कानूनी कब्जा कर रखा है और वहां रहने वाले कश्मीरी लोगों के बुनियादी हकूक लगातार कुचले जा रहे हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से अपील की कि वह PoJK में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर गंभीरता से गौर करे और वहां की अवाम की आवाज़ सुने।
PoJK की अवाम का कहना है कि उन्हें न तो अपने भविष्य का फैसला करने का पूरा हक हासिल है और न ही राजनीतिक आज़ादी। इलाके में होने वाले चुनाव भी अक्सर सवालों के घेरे में रहते हैं। इस महीने के आखिर में प्रस्तावित चुनावों को लेकर भी लोगों में खासा असंतोष है। स्थानीय सियासी हलकों का मानना है कि चुनावी प्रक्रिया पर पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसियों का गहरा असर रहता है, जिससे लोकतंत्र की असल रूह कमजोर पड़ जाती है।
कश्मीरी अवाम का आरोप है कि जो लोग अपने हक की बात करते हैं, उन्हें दबाने की कोशिश की जाती है। कई मौकों पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग, गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई की खबरें सामने आती रही हैं। यही वजह है कि इलाके में नाराजगी और बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है।
ब्रिटिश संसद में उठी यह आवाज पाकिस्तान के लिए एक बड़ा सियासी झटका मानी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहले ही कई बार PoJK में लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब ब्रिटेन जैसे अहम मुल्क की संसद में इस मुद्दे का उठना पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ा सकता है।
माहिरों का मानना है कि PoJK की अवाम अब अपने हकूक और बेहतर मुस्तकबिल की मांग को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो चुकी है। सोशल मीडिया और दूसरे जरियों के जरिए उनकी आवाज दुनिया तक पहुंच रही है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए पुराने तरीके से हालात को काबू में रखना आसान नहीं होगा।
आने वाले दिनों में PoJK के चुनावों पर दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी। यह देखना अहम होगा कि वहां की अवाम को कितनी आज़ादी के साथ अपने नुमाइंदे चुनने का मौका मिलता है और क्या उनकी आवाज़ को वाकई अहमियत दी जाती है या नहीं।
ब्रिटिश संसद में हुई यह बहस एक बार फिर यह याद दिलाती है कि PoJK का मसला सिर्फ एक भू-राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि वहां रहने वाली लाखों जिंदगियों से जुड़ा हुआ सवाल है। अवाम इंसाफ, अमन और अपने बुनियादी हकूक की उम्मीद लगाए बैठी है। अब यह देखना बाकी है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उनकी इस पुकार को कितनी संजीदगी से सुनती है।


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