पाकिस्तान में फिर सक्रिय हुआ आतंक का ढांचा, एबटाबाद में लश्कर-ए-तैयबा की सार्वजनिक सभा


पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के दावों के बीच एबटाबाद में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़ी एक सार्वजनिक सभा आयोजित किए जाने की खबरों ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस एबटाबाद को दुनिया उस स्थान के रूप में जानती है जहां अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन वर्षों तक छिपा रहा, वहीं अब एक बार फिर आतंकवादी विचारधारा से जुड़े तत्वों की खुली गतिविधियां पाकिस्तान की नीतियों पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

सूत्रों के अनुसार, इस सार्वजनिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी देखी गई और मंच से ऐसे संदेश प्रसारित किए गए जिन्हें कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने वाला माना जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे आयोजनों का खुलेआम होना इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान में प्रतिबंधित या विवादित संगठनों के नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, बल्कि नए स्वरूप में सक्रिय बने हुए हैं।

ख़ास बात यह है कि इस तरह की गतिविधियां ऐसे समय में सामने आई हैं जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता जताता रहा है। इसके बावजूद, आतंकवादी संगठनों से जुड़े तत्वों का सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करना और उन्हें सामाजिक या राजनीतिक मंच उपलब्ध होना, इन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

माहिरों का मानना है कि पाकिस्तान की हुकूमत और फौजी ढांचे पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि कुछ आतंकी संगठनों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संरक्षण मिलता रहा है। एबटाबाद में आयोजित यह सभा उन आरोपों को नई चर्चा दे रही है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि किसी देश में आतंकवाद से जुड़े संगठनों के समर्थक खुलेआम सभाएं आयोजित कर सकते हैं, तो यह कानून लागू करने वाली संस्थाओं की भूमिका और मंशा दोनों पर सवाल उठाता है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू हाफिज़ सईद के परिवार से जुड़े लोगों की कथित सक्रियता को लेकर है। सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि लश्कर-ए-तैयबा और उससे जुड़े नेटवर्क में परिवार आधारित संरचना लंबे समय से बनी हुई है। ऐसे में संगठन के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े परिवारों की गतिविधियां इस बात का संकेत मानी जाती हैं कि संगठनात्मक ढांचा अभी भी प्रभावी रूप से काम कर रहा है। आलोचकों का आरोप है कि प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद इन नेटवर्कों ने अपना प्रभाव पूरी तरह नहीं खोया है।

कश्मीरी अंदाज़ में कहें तो, “ये मंज़र एक बार फिर यही सवाल उठाता है कि आखिर पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अपनी बात और ज़मीनी हक़ीक़त में मौजूद फ़र्क़ को कब दूर करेगा।” वादी के सियासी जानकारों का मानना है कि जब तक ऐसे संगठनों को सार्वजनिक गतिविधियों की इजाज़त मिलती रहेगी, तब तक क्षेत्रीय अमन-ओ-अमान के लिए खतरे पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे।

अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर्यवेक्षकों के मुताबिक, एबटाबाद का प्रतीकात्मक महत्व भी कम नहीं है। यही वह शहर है जिसने दुनिया को यह दिखाया था कि वैश्विक आतंकवाद के सबसे बड़े चेहरों में से एक यहां वर्षों तक मौजूद रहा। अब उसी स्थान पर लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े सार्वजनिक आयोजन होने की खबरें पाकिस्तान की आतंकवाद-विरोधी छवि को और अधिक नुकसान पहुंचा सकती हैं।

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता साबित करना चाहता है, तो उसे केवल बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ऐसे संगठनों और उनसे जुड़े नेटवर्कों के खिलाफ ठोस और पारदर्शी कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा, इस तरह की घटनाएं बार-बार यह धारणा मजबूत करेंगी कि देश के भीतर आतंकवादी पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है।

अवाम के बीच भी यह चर्चा तेज़ है कि जब दुनिया आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई की बात कर रही है, तब एबटाबाद जैसे संवेदनशील शहर में ऐसे आयोजनों का होना पाकिस्तान की नीतियों और उसकी प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यही वजह है कि यह घटना एक बार फिर पाकिस्तान पर आतंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय निगाहें केंद्रित कर रही है और उसके दावों की वास्तविकता को कठघरे में खड़ा कर रही है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ